धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—912

पुराने समय में एक संत अपने शिष्य के साथ लगातार यात्राएं करते रहते थे। बीच-बीच में वे किसी गांव में कुछ दिन ठहर जाते और वहां के लोगों को उपदेश देकर फिर आगे की यात्रा शुरू करते थे। संत का स्वभाव अत्यंत सरल था और उनकी वाणी में ऐसी मिठास थी कि जो भी उनसे मिलता, वह उनका अनुयायी बन जाता था। एक बार वे ऐसे ही किसी गांव में रुके हुए थे। गांव के लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास आने लगे। कोई पारिवारिक कलह से दुखी था, कोई आर्थिक संकट से, तो कोई तनाव से। संत सभी को धैर्य, समझ और सदाचार का मार्ग बताते।

धीरे-धीरे संत की ख्याति पूरे इलाके में फैल गई। दूर-दूर से लोग उनके प्रवचन सुनने आने लगे। गांव का वातावरण भी बदलने लगा। लोग पहले से अधिक शांत और सकारात्मक रहने लगे, लेकिन गांव का एक पुजारी यह सब देखकर भीतर ही भीतर जलने लगा था। उसे डर था कि लोग अब उसके पास कम आएंगे और संत को अधिक मान-सम्मान देंगे, इससे उसकी कमाई भी बंद हो जाएगी।

ईर्ष्या ने धीरे-धीरे उसके मन को घेर लिया। उसने गांव में संत के खिलाफ बातें फैलानी शुरू कर दीं। वह लोगों से कहता, “यह संत केवल दिखावा करता है। यह लोगों को भ्रमित कर रहा है।” कुछ लोग उसकी बातों में आ गए और संत की आलोचना करने लगे। पुजारी के साथी भी जगह-जगह संत की छवि खराब करने का प्रयास करने लगे।

एक दिन संत का शिष्य बाजार से गुजर रहा था। वहां उसने कुछ लोगों को अपने गुरु की बुराई करते सुना। वह गुस्से से भर उठा। उसका मन हुआ कि तुरंत जाकर उन लोगों को जवाब दे, लेकिन वह स्वयं को रोकते हुए संत के पास पहुंचा और सारी बातें बता दीं।

शिष्य बोला, “गुरुदेव, लोग आपकी इतनी बुराई कर रहे हैं और आप शांत बैठे हैं। क्या हमें उन्हें जवाब नहीं देना चाहिए?”

संत मुस्कुराए और शांत स्वर में बोले, “बेटा, संसार में हर व्यक्ति हमारे पक्ष में नहीं होगा। कुछ लोग बिना कारण भी विरोध करेंगे। अगर हम हर आलोचना का जवाब देने लगें, तो अपने लक्ष्य से भटक जाएंगे।”

फिर संत ने कहा, “जिस प्रकार हाथी अपनी मस्त चाल में चलता रहता है और रास्ते में भौंकते कुत्तों पर ध्यान नहीं देता, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति भी आलोचनाओं से विचलित नहीं होता। हमें अपना ध्यान अपने कर्म और उद्देश्य पर रखना चाहिए।”

शिष्य को गुरु की बात समझ आ गई। उसने सीखा कि महान बनने का रास्ता शांति, धैर्य और आत्मविश्वास से होकर गुजरता है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, समाज में हर व्यक्ति हमारे विचारों से सहमत नहीं हो सकता। कुछ लोग हमारा समर्थन करेंगे, तो कुछ विरोध भी करेंगे। कई बार लोग हमारी सफलता, लोकप्रियता या अच्छे कामों से जलन महसूस करते हैं और हमारी आलोचना करने लगते हैं। ऐसी परिस्थितियों में स्वयं को संभालना ही सच्ची जीवन कला है।

Shine wih us aloevera gel

Related posts

सत्यार्थप्रकाश के अंश—23

Jeewan Aadhar Editor Desk

इस समय लगेगा चंद्र ग्रहण, जानें सूतक काल की टाइमिंग और सावधानियां

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—261