धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—928

एक बार एक युवक एक संत के पास पहुँचा। वह बहुत परेशान था। उसने कहा, “गुरुदेव, मैं कुछ दिन तक अच्छे काम करता हूँ, लोगों की मदद करता हूँ, मेहनत भी करता हूँ, लेकिन जब तुरंत परिणाम नहीं मिलता तो मेरा उत्साह खत्म हो जाता है। लगता है कि सब व्यर्थ है।”

संत मुस्कुराए और उसे अपने साथ आश्रम के पीछे ले गए। वहाँ एक छोटा-सा बाँस का पौधा लगा था।

संत ने पूछा, “तुम्हें पता है, इसे लगाए कितने वर्ष हो गए?”

युवक बोला, “शायद एक-दो साल।”

संत ने कहा, “नहीं, पाँच वर्ष। पहले चार वर्षों तक यह जमीन के ऊपर मुश्किल से कुछ इंच बढ़ा। जो भी इसे देखता, कहता कि इतनी मेहनत और पानी देने का क्या लाभ? लेकिन इसका मालिक रोज इसे सींचता रहा।”

युवक ने आश्चर्य से पूछा, “फिर क्या हुआ?”

संत बोले, “पाँचवें वर्ष यह बाँस कुछ ही महीनों में कई फीट ऊँचा हो गया। क्या यह केवल पाँचवें वर्ष में बढ़ा? नहीं। पहले चार वर्षों तक यह अपनी जड़ों को मजबूत कर रहा था। यदि वह बीच में पानी देना छोड़ देता, तो बाँस कभी इतना ऊँचा नहीं बढ़ता।”

संत ने युवक की ओर देखते हुए कहा, “मनुष्य का जीवन भी इसी बाँस की तरह है। अच्छे कार्य, ईमानदारी, परिश्रम और सेवा तुरंत फल नहीं देते। वे पहले तुम्हारे चरित्र, धैर्य और व्यक्तित्व की जड़ें मजबूत करते हैं। जब समय आता है, तो सफलता भी मिलती है और सम्मान भी।”

युवक ने पूछा, “तो क्या अच्छे काम करते समय फल की चिंता नहीं करनी चाहिए?”

संत बोले, “यदि किसान हर दिन बीज खोदकर देखने लगे कि अंकुर निकला या नहीं, तो फसल कभी नहीं होगी। बीज बोने के बाद उसका कर्तव्य है निरंतर देखभाल करना। फल समय पर स्वयं आएगा।”

उस दिन युवक समझ गया कि सफलता किसी एक बड़े प्रयास का परिणाम नहीं होती, बल्कि छोटे-छोटे अच्छे कार्यों की निरंतरता से जन्म लेती है। उसने बिना रुके अपना कार्य करना शुरू किया और कुछ वर्षों बाद वही युवक अपने क्षेत्र में एक सम्मानित और सफल व्यक्ति बन गया।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अच्छे कार्यों की गति धीमी लग सकती है, लेकिन वे कभी व्यर्थ नहीं जाते। निरंतर सद्कर्म व्यक्ति के चरित्र को निखारते हैं, व्यक्तित्व का विकास करते हैं और अंततः सफलता तथा सम्मान का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

Shine wih us aloevera gel

Related posts

ओशो : पंच महाव्रत

ओशो : काहे होत अधीर

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—173