धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—898

स्वामी विवेकानंद से जुड़ा एक ऐसा किस्सा प्रसिद्ध है, जिसमें बताया गया है कि मां को सबसे महान क्यों माना जाता है। एक बार एक व्यक्ति ने स्वामी विवेकानंद से प्रश्न किया- “स्वामी जी, इस संसार में सबसे अधिक महत्व मां को ही क्यों दिया जाता है?”

स्वामी विवेकानंद मुस्कुराए। उन्होंने उस व्यक्ति से कहा, “यदि तुम इस प्रश्न का उत्तर समझना चाहते हो, तो पहले एक काम करो। पांच सेर का एक पत्थर लो, उसे कपड़े में बांधो और अपनी कमर से बांधकर पूरे दिन ऐसे ही रहो। कल सुबह इसी अवस्था में मुझसे मिलना। मैं तुम्हें तुम्हारे प्रश्न का उत्तर समझा दूंगा।”

उस व्यक्ति ने स्वामी जी की बात मान ली। उसने पांच सेर का एक पत्थर लिया और अपनी कमर पर बांध लिया। वह पूरे दिन उस भारी पत्थर को कमर में बांधकर घूमता रहा। कुछ ही घंटों में उसे भारी असहजता, थकान और दर्द महसूस होने लगा। जब उससे ये दर्द सहन नहीं हुआ, तो वह स्वामी जी के पास पहुंचा।

वह बोला, “स्वामी जी, यह तो बहुत कठिन था। मैं एक दिन भी यह बोझ नहीं सह पाया। आपने ऐसा करने को क्यों कहा?”

स्वामी विवेकानंद ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “तुम एक पत्थर का भार कुछ घंटे भी सहन नहीं कर पाए, जबकि एक मां अपने बच्चे को नौ महीने अपने गर्भ में रखती है। वह केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक कष्ट भी सहती है। फिर भी वह मुस्कुराती है, घर संभालती है और अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटती।”

यह सुनकर उस व्यक्ति की आंखें भर आईं। उसे समझ आ गया कि मां का त्याग सबसे महान है। इसलिए मां को महान कहा गया है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन हमेशा हमारे अनुसार नहीं चलता है। ऐसे में धैर्य रखना और परिस्थितियों को समझकर प्रतिक्रिया देना एक मजबूत व्यक्तित्व की पहचान है। सहनशीलता का गुण मां से सीख सकते हैं।

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