हिसार

मंडी आदमपुर पंचायत चुनाव में होगा तिकोणा मुकाबला, चुनाव प्रबंधन करेगा जीत का चेहरा तय

आदमपुर,
10 मई को काफी सालों के बाद मंडी आदमपुर व जवाहर नगर को सरपंच मिलने वाले हैं। चुनावी बिगुल बज चुका है। हर गली में..ही चौराहे पर सरंपच कौन की चर्चा चल रही है। महज 18 महीने के लिए सरपंची का चुनाव होना है या पूरे 5 साल का चर्चा-इस बात की भी चल रही है। 21 अप्रैल से नामांकन की प्रक्रिया आरंभ हो जाएगी। फिलहाल चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवार बैंकों, बिजली निगम, जन स्वास्थ्य विभाग के कार्यालयों के चक्कर लगाकर नो—ड्यूज ले रहे हैं। बैंकों में सरंपचों की जगह पंच की चाहत वाले चेहरों की भीड़ ज्यादा है। ऐसा ही नजारा बिजली निगम के कार्यालय और जन स्वास्थ्य विभाग के कार्यालयों में देखने को मिल रहा है।

मंडी आदमपुर में सरपंच को लेकर नहीं उत्सुकता
ग्राम पंचायत मंडी आदमपुर में लोगों में सरपंची को लेकर कोई विशेष रुचि दिखाई नहीं दे रही। वही पुराने चहरे मैदान में है। कोई नयापन दिखाई नहीं दे रहा। वर्तमान समय में जगतपाल अग्रवाल, जगदीश भादू और अप्रत्यक्ष रुप से लक्ष्मी गोयल मैदान में ताल ठोक रहे हैं। लक्ष्मी गोयल अप्रत्यक्ष रुप से इसलिए क्योंकि इस बार वो अपनी जगह अपने बेटे मोहित गोयल को चुनाव लड़ा रही है। ऐसे में बेटा महज चेहरा है—चुनाव लक्ष्मी देवी ही लड़ रही है। वहीं पंचायती चुनाव मैदान का एक बड़ा चेहरा राजेंद्र सारंगपुरिया इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे।

जगतपाल अग्रवाल में सरपंच सुभाष अग्रवाल की छवि
सबसे पहले जगतपाल अग्रवाल की बता करें तो बहुत ठंडे और मिलनसार स्वभाव के पढ़े—लिखे युवा है। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनके पिता का नाम है। स्व.सुभाष अग्रवाल ग्राम पंचायत मंडी आदमपुर के 10 साल तक सरपंच रहे थे। उनकी सरपंची को आम आदमी की सरपंची के रुप में लोगों ने देखा। जमकर विकास कार्य करवाएं। कभी किसी पर गुस्सा नहीं हुए। कितना भी बड़ा मामला हो सहज मुस्कान और फलदार वृक्ष की तरह झुककर हल किया। उनकी इसी छवि को जनता जगतपाल अग्रवाल में देख रही है। जगतपाल अग्रवाल भी उनकी इस छवि को आगे रखकर वोट की चाह रख रहे हैं। अग्रवाल समाज के बहुत वोट होना भी उनका पॉजिटिव प्वाइंट माना जाता है। लेकिन इस प्वाइंट पर कहीं न कहीं लक्ष्मी गोयल गहरी चोट मारती हुई नजर आ रही है।

जहां समस्या—वहां जगदीश भादू
अब बात करते है जगदीश भादू की। जबदीश भादु पिछले काफी समय चुनाव लड़ते आ रहे है। वे एमएलए से लेकर पंचायत के अनेक चुनाव लड़ चुके हैं। जगदीश भादू मिलनसार है, मीठे है लेकिन जहां बात गर्मी की आती है तो वे कड़वे भी हो जाते हैं। यानि वो समय के अनुसार अपने को ढ़ालने की विविधता रखने की कला में निपुण है। जब से मंडी आदमपुर व जवाहर नगर में पानी, सिवरेज और सड़क की समस्या ने आमजन के जीवन को प्रभावित करना आरंभ किया—जगदीश भादू ने घर की चारदीवारी छोड़कर सड़क पर रहना आरंभ कर दिया। जहां समस्या—वहां जगदीश भादू…कुछ ऐसी ही पहचान उनकी बन चुकी हैं। आलम ये है कि गंदा पानी आने पर या सिवरेज रुक जाने पर लोग अधिकारियों को फोन करने की जगह जगदीश भादू को फोन करने लगे हैं। आमजन को जगदीश भादू में अब समस्या का हल दिखाई देने लगा है। उनकी ये छवि 2022 से बननी आरंभ हुई और वर्तमान समय पर चरम पर है। जगदीश भादू की ये छवि तटस्थ वोटरों को लुभा रही है। जगदीश भादू का सबसे नेगटिव प्वाइंट बिश्नोई वोटरो का मंडी आदमपुर में कम होना है। लेकिन पॉजिटिव प्वाइंट ये है कि उनको हर जाति का तटस्थ वोटर खुलकर समर्थन दे रहा है।

निडरता और कार्यक्षमता का नाम लक्ष्मी गोयल
तीसरा सबसे बड़ा चेहरा है लक्ष्मी गोयल है। लक्ष्मी गोयल पहले भी सरपंची का चुनाव लड़ चुकी है। वर्तमान समय में वो भाजपा की जिला उपाध्यक्ष है। हिसार में रहती है, लेकिन आदमपुर में उनकी जड़े काफी मजबुत है। लक्ष्मी गोयल की पहचान निडरता है। चाहे कोई कितना भी बड़ा अधिकारी हो वो अपनी बात निडरता से रखती है। काम करवानी की क्षमता काफी अधिक है। एक तरफ महिलाओं में बहुत ज्यादा पकड़ है तो वहीं पुरुषों में उनकी पहचान मर्दाना लेडीज के रुप में है। सबसे बड़ी खूबी एक फोन पर हाजिर होकर काम करवाने की रही है। सरकार से जुड़ी पार्टी में होने के कारण अधिकारियों पर भी अच्छी पकड़ है। ऐसे में विकास कार्यों में आई रुकावट को दूर करवाने का मादा रखती है। लेकिन लक्ष्मी देवी की सबसे बड़ी कमजोरी उनका आदमपुर की जगह हिसार रहना है। ऐसे में चुनाव के समय यह सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा कि आदमपुर का भावी सरपंच आदमपुर में ही नहीं रहता। हलांकि इस कमी को दूर करने के लिए वे जल्द ही आदमपुर में शिफ्ट हो जायेंगे लेकिन फिलहाल यह मुद्दा लगातार सोशल मीडिया पर तैराकी कर रहा है।

कुल मिलाकर मुकाबला तिकोणा है। ऐसे में जीत के लिए मायने रखेगी चुनाव को अंतिम समय तक संभलाने की ताकत। जिसका चुनाव प्रबंधन दमदार होगा—उसकी जीत होगी। इस चुनाव में वोट काटने वाले चेहरे मैदान में फिलहाल दिखाई नहीं दे रहे। ऐसे में मुकाबला सीधा होगा। सीधे मुकाबले में चुनाव प्रबंधन ही सबसे ज्यादा महत्व रखता है। इससे एक बात तो सीधेतौर पर कही जा सकती है कि इस चुनाव में हार—जीत का अंतर नजदीकी न होकर काफी बड़ा होगा। जो भी उम्मीदवार जीतेगा वह 1 हजार से ज्यादा वोटो से ही जीतेगा।

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