हिसार

मंडी आदमपुर ग्राम पंचायत चुनाव : वर्षों बाद फिर राजनीति की तरफ बढ़ा सरपंची का चुनाव

मंडी आदमपुर,
मंडी आदमपुर में 10 मई को पंचायत का चुनाव होने जा रहा है। आदमपुर क्षेत्र में वर्षों से पंचायती चुनाव आपसी भाईचारे से सम्पन्न होते आए हैं। सरपंची के चुनाव में कोई भी राजनेता कभी सीधे तौर पर दखल नहीं देते। ना प्रचार करते हैं और ना ही अपना उम्मीदवार खड़ा करते हैं। करीब 35—40 साल पहले सेठ पूनम चंद सीसवालिया और प्रकाशचंद्र के चुनाव में राजनीतिक दखल दर्ज की गई थी। लेकिन उस चुनाव के बाद से राजनेताओं ने सरपंची के चुनाव से दूरी बना ली। लेकिन काफी साल बाद शुक्रवार को सरपंची का चुनाव फिर राजनीतिक रुप लेता हुआ दिखाई दिया।

भाजपा नेता व पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ.कमल गुप्ता ने शुक्रवार को मंडी आदमपुर में करीब 14 जगहों पर जाकर जलपान किया। जलपान का कारण सीधे तौर पर सरपंच पद पर मोहित गोयल के लिए समर्थन मांगना था। इस दौरान उन्होंने लोगों से पूछा कि वे 10 मई को विजयी जुलूस में आए या नहीं। मोहित गोयल के समर्थन में पहले भी कई भाजपा नेता आदमपुर में शिरकत कर चुके हैं। लेकिन पहले बार पूर्व कैबिनेट मंत्री ने मोहित गोयल के लिए वोट मांगने का काम किया। ऐसे में ये चुनाव अब राजनीति बेनाम भाईचारा बनता नजर आने लगा है।

मोहित गोयल को लेकर पहले भी सोशल मीडिया पर प्रचार किया जा रहा है कि उनकी माता लक्ष्मी देवी जोकि इस समय भाजपा की जिला उपाध्यक्ष है, उनको पार्टी द्वारा कोई बड़ा पद दिया जा रहा है। ऐसे में यदि मोहित गोयल सरपंच बनते है तो वे मंडी आदमपुर का विकास काफी बेहतर ढंग से करवा पायेंगे। पूर्व कैबिनेट मंत्री ने इस चुनाव में उतरकर साफ कर दिया कि आने वाले एक हफ्ते में मंडी आदमपुर के सरपंची के चुनाव में काफी उल्टफेर हो सकते हैं।

वहीं दूसरी तरफ जगदीश भादू, जगतपाल व राकेश जांगड़ा इस चुनाव को राजनीति से दूर भाईचारे के चुनाव के रुप में लड़ रहे हैं। वहीं क्षेत्र के कुछ लोगों का कहना है कि फिलहाल ये चुनाव किसी राजनीतिक दल के निशान पर नहीं लड़े जा रहे। ये चुनाव पूरी तरह से भाईचारे का चुनाव है। ऐसे में किसी भी पार्टी के नेताओं को सीधे तौर पर इस चुनाव में दखल नहीं देना चाहिए। दूसरी तरफ कुछ लोगों का कहना है कि यदि सत्ताधारी पार्टी से जुड़े व्यक्ति को सरपंच बनाया जाता है तो वह सरकार से ज्यादा ग्रांट लाकर क्षेत्र का विकास करवा सकता है। इनका मानना है कि इस बार ग्राम पंचायत को कार्यकाल केवल 18 माह का है। ऐसे में सत्ता से जुड़े लोग ही बेहतर विकास करवा पायेंगे।

बेहरहाल, लोगों के तर्क अपनी जगह—लेकिन वर्षों बाद पंचायती चुनाव में राजनीतिक दखल ने पूरी तरह से चुनाव के माहौल को गर्म बना दिया है। पहले जो मुकाबला तिकोणा लग रहा था अब वह मुकाबला रोचक होने के साथ—साथ राजनीतिक बनाम आपसी भाईचारा बनता नजर आने लगा है।

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