हिसार

पंचायत चुनाव में आदमपुर क्षेत्र को फिर रास नहीं आई बड़ी नेताओं की दखलअंदाजी, भाजपा नेताओं को नकारा

मंडी आदमपुर,
आदमपुर क्षेत्र में रविवार को दो ग्राम पंचायतों का चुनाव हुआ। मंडी आदमपुर ग्राम पंचायत से सरपंच पद के लिए भाजपा के जिला उपाध्यक्ष लक्ष्मी देवी ने अपने बेटे मोहित गोयल को चुनाव मैदान में उतारा। लक्ष्मी देवी का अपना एक वोट बैंक आदमपुर में है। लेकिन उनके चुनाव को गति देने के लिए प्रचार के लिए भाजपा नेता व पूर्व मंत्री डॉ. कमल गुप्ता व भाजपा जिलाध्यक्ष आशा खेदड़ भी मैदान में उतरे। लेकिन इसके बाद उनके हिस्से में जीत नहीं आई।

पूर्व मंत्री के कारण टूटे वोट
मंडी आदमपुर की जनता लक्ष्मी देवी की कार्यप्रणाली को पसंद कर रही थी। उनके बेटे को वोट भी देना चाहती थी। लेकिन इसी दौरान लक्ष्मी देवी ने गलत निर्णय लेते हुए डा.कमल गुप्ता को प्रचार मैदान में उतार दिया। उन्होंने एक दिन करीब 14 जगहों पर बैठक की। इससे मंडी आदमपुर के वोटर लक्ष्मी देवी से दूर हो गए। अधिकतर लोगों का कहना है कि वे कुछ अवसरों पर काम के लिए मंत्री पद पर बैठे डा. कमल गुप्ता से मिले तो उन्होंने कभी सीधे मुंह बात नहीं की। ऐसे में अब उनको वोट की चोट करने का मौका है। इसे चलते लोगों ने जमकर लक्ष्मी देवी के बेटे के खिलाफ वोट किए।

भ्रष्टाचार बना मुद्दा
डा. कमल गुप्ता जब मंत्री थे तो उन्होंने मंडी आदमपुर व जवाहर नगर को मिलाकर नगरपालिका का दर्जा दिया। लेकिन नगरपालिका बनने के बाद यहां नियु​क्त स्टाफ ने भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड ही तोड़ दिया। लोग इस कदर परेशान हुए कि नगरपालिका तुड़वाने के लिए धरने पर बैठ गए। लगातार कई दिनों तक धरना चला। और अंत में नगरपालिका को तोड़ना पड़ा। लोगों की शिकायत है कि नगरपालिका के दौरान कई बार डा.कमल गुप्ता से भ्रष्ट तंत्र को लेकर बात की। लेकिन उन्होंने कभी भी लोगों की शिकायतों पर कान नहीं दिए। इससे लोगों के मन में डा.कमल गुप्ता के प्रति नराजगी का भाव था।

भाजपा से नराजगी
भाजपा जिलाध्यक्ष आशा खेदड़ भी मंडी आदमपुर पंचायत चुनाव में लक्ष्मी देवी के पक्ष में आई। लोगों को आदमपुर में टूटी सड़कों, सिवरज, गंदे पेयजल सप्लाई को लेकर भाजपा से नाराजगी थी। इसके चलते जैसे ही पंचायत चुनावों में भाजपा नेता उतरे तो जनता ने लक्ष्मी देवी से दूरी बना ली। लक्ष्मी देवी ने अपनी हर नक्कड़ सभा में सरकार के नजदीक होने का दावा किया। ऐसे में लोगों का कहना था कि यदि सरकार में इतनी ही पकड़ थी तो आदमपुर की समस्याओं को हल क्यों नहीं करवाया। पूरे आदमपुर की सड़के 4 साल तक टूटी रही तो ये चुप क्यों थी?

कुल मिलाकर सरकार से नजदीकियां व भाजपा नेताओं को मैदान में उतारना लक्ष्मी देवी को भारी पड़ गया। इससे न केवल उनका अपना पर्सनल वोट बैंक उनसे खिसक गया बल्कि नए वोटर भी उनसे नहीं जुड़े। लोगों का कहना है कि लक्ष्मी देवी यदि इस चुनाव को केवल अपने नाम पर लड़ती तो नतीजे काफी रोचक होते।

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