धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—938

पुराने समय में एक राजा अपनी शक्ति और धन के लिए प्रसिद्ध था। उसके पास सोने-चांदी के खजाने, रत्न और विशाल सेना थी। धीरे-धीरे इन उपलब्धियों ने उसके भीतर अहंकार भर दिया। उसे लगता था कि संसार में उससे बड़ा और महत्वपूर्ण व्यक्ति कोई और नहीं है।

राजा अक्सर महावीर स्वामी के दर्शन करने जाता था। हर बार वह अपने साथ बहुमूल्य उपहार लेकर पहुंचता। कभी सोने की थाल, कभी हीरे-जवाहरात, तो कभी दुर्लभ रत्न। वह सोचता था कि इतने कीमती उपहार देखकर महावीर स्वामी अवश्य प्रसन्न होंगे, लेकिन हर बार महावीर स्वामी मुस्कुराकर केवल एक ही बात कहते, “राजन्, इन्हें गिरा दो।”

राजा स्वामी की आज्ञा मानकर उपहार वहीं रख देता, लेकिन उसके मन में सवाल उठता कि आखिर स्वामी इन वस्तुओं को स्वीकार क्यों नहीं करते। कई बार ऐसा ही होने पर राजा के मन में चिंता बढ़ने लगी। उसे लगा कि शायद स्वामी उसके सम्मान की कद्र नहीं करते।

एक दिन उसने अपने मंत्री से सलाह मांगी। मंत्री बुद्धिमान था। उसने कहा, “राजन्, अगली बार केवल फूल लेकर जाइए।”

राजा फूल लेकर पहुंचा। उसने श्रद्धा से फूल अर्पित किए, लेकिन इस बार भी महावीर स्वामी ने वही कहा, “इन्हें गिरा दो।”

राजा और अधिक निराश हो गया। तब मंत्री ने सुझाव दिया कि अगली बार वह खाली हाथ जाए।

दूसरे दिन राजा बिना किसी उपहार के महावीर स्वामी के पास पहुंचा। उसने कहा, “स्वामी जी, अब मैं कुछ भी लेकर नहीं आया हूं। अब आप क्या गिराने को कहेंगे?”

महावीर स्वामी ने शांत स्वर में कहा, “राजन्, अब स्वयं को गिरा दो।”

राजा चौंक गया। कुछ क्षण बाद वह समझ गया कि स्वामी वस्तुओं की नहीं, उसके अहंकार की बात कर रहे थे। उसने महसूस किया कि उसने धन, पद और शक्ति को अपनी पहचान बना लिया था।

उस दिन राजा ने विनम्रता का मार्ग अपनाने का संकल्प लिया। उसने समझ लिया कि जीवन की सबसे बड़ी जीत दूसरों पर नहीं, बल्कि अपने अहंकार पर विजय पाना है। तभी मन में शांति, रिश्तों में मधुरता और जीवन में सच्ची सफलता मिलती है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में प्रगति करना अच्छी बात है, लेकिन जब उपलब्धियां घमंड में बदल जाएं, तो वे विकास को रोक देती हैं। समय-समय पर स्वयं से पूछें कि कहीं सफलता ने आपको दूसरों से श्रेष्ठ समझने की आदत तो नहीं दे दी।

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