एक गाँव में एक कुम्हार ने दो सुंदर दीपक बनाए। एक दीपक गाँव के बड़े मंदिर में जलाया गया, जहाँ रोज़ सैकड़ों लोग उसे देखते और उसकी प्रशंसा करते थे। दूसरा दीपक एक छोटे से घर में रखा गया, जहाँ वह केवल एक गरीब परिवार के आँगन को रोशन करता था।
एक दिन छोटे दीपक ने मंदिर वाले दीपक से कहा,”तुम कितने भाग्यशाली हो। तुम्हारी रोशनी सब देखते हैं, तुम्हारी तारीफ़ करते हैं। मेरी रोशनी तो बस एक छोटे से घर तक सीमित है।”
मंदिर का दीपक मुस्कुराया और बोला, “मैं लोगों को पूजा का रास्ता दिखाता हूँ, लेकिन तुम उस परिवार के बच्चों को पढ़ने की रोशनी देते हो, बूढ़ी माँ को रसोई तक पहुँचाते हो और रात में उनके डर को दूर करते हो। हमारी जगह अलग है, लेकिन उद्देश्य एक ही है—प्रकाश फैलाना।”
तभी वहाँ से एक संत गुज़रे। उन्होंने दोनों दीपकों की बात सुनी और कहा, “जो दीपक दूसरे की लौ देखकर दुखी होता है, वह अपनी चमक खो देता है। और जो अपनी क्षमता के अनुसार जलता है, वही संसार में सच्चा प्रकाश फैलाता है।”
छोटे दीपक ने उस दिन के बाद कभी अपनी तुलना नहीं की। वह पहले से अधिक उजाला देने लगा। कुछ समय बाद उसी घर का एक बच्चा पढ़-लिखकर बड़ा अधिकारी बना। उसने कहा, “मेरी सफलता की शुरुआत उस छोटे दीपक की रोशनी से हुई थी।”
संत ने मुस्कुराकर कहा, “दूसरों की सफलता से प्रेरणा लो, ईर्ष्या नहीं। क्योंकि हर व्यक्ति की मंज़िल, समय और भूमिका ईश्वर ने अलग लिखी है। तुलना मन में असंतोष पैदा करती है, जबकि अपने कर्म पर ध्यान मन में शांति और सफलता दोनों लाता है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, दूसरों की सफलता देखकर प्रेरित होना बुद्धिमानी है, लेकिन अपनी खुशी को उनकी उपलब्धियों से तौलना मूर्खता है। हर जीवन की यात्रा अलग होती है। जो अपनी राह पर चलता है, वही सच्ची संतुष्टि और सफलता प्राप्त करता है।








