एक गाँव में एक वृद्ध संत रहते थे। उनके पास एक युवक रोज़ अपनी परेशानियाँ लेकर आता था। एक दिन वह बहुत दुखी था। उसने संत से कहा, “गुरुदेव, बाहर के लोगों की बातें तो मैं सह लेता हूँ, लेकिन अपने ही लोग ताने मारते हैं। उनके शब्द दिल को चीर देते हैं।”
संत मुस्कुराए और उसे अगले दिन आने को कहा। अगली सुबह संत युवक को अपने साथ खेतों की ओर ले गए। रास्ते में उन्होंने एक पका हुआ आम का पेड़ दिखाया। गाँव के बच्चे उस पर पत्थर मार रहे थे। पेड़ चुपचाप पत्थरों की चोट सह रहा था और बदले में मीठे आम गिरा रहा था।
संत ने पूछा, “बेटा, बच्चे पत्थर किस पेड़ को मार रहे हैं?”
युवक बोला, “जिस पर फल लगे हैं।”
संत ने फिर पूछा, “क्या तुमने कभी किसी सूखे पेड़ को पत्थर खाते देखा है?”
युवक ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं।”
संत उसे थोड़ी दूर ले गए। वहाँ एक बूढ़ी माँ अपने बेटे की डाँट सुनकर भी उसके लिए रोटी बना रही थी। संत बोले, “जिसने अपनों के कटु वचन सहना सीख लिया, उसके भीतर सहनशीलता का ऐसा वृक्ष उग जाता है कि दुनिया के पत्थर भी उसे तोड़ नहीं पाते।”
युवक बोला, “लेकिन अपने ही ऐसा क्यों करते हैं?”
संत ने उत्तर दिया, “अपने लोगों के शब्द हमें इसलिए अधिक चुभते हैं क्योंकि उनसे हमें प्रेम और सम्मान की अपेक्षा होती है। यदि तुम उनके कठोर शब्दों से धैर्य, क्षमा और आत्मबल सीख गए, तो फिर संसार की आलोचना और अपमान तुम्हें डिगा नहीं पाएंगे।”
कुछ वर्षों बाद वही युवक एक सफल और सम्मानित व्यक्ति बन गया। लोगों ने उससे उसकी सफलता का रहस्य पूछा।
वह मुस्कुराकर बोला, “मैंने जीवन में एक बात सीख ली है—जब आदमी अपनों के कहे बोल सहना सीख जाता है, तब बेगानों के मारे पत्थर भी उसे दर्द नहीं देते। क्योंकि जो मन अपनों की परीक्षा में मजबूत हो जाए, उसे दुनिया की ठोकरें गिरा नहीं सकतीं।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “जीवन में सबसे बड़ी ताकत प्रतिशोध नहीं, सहनशीलता है। अपनों के कटु वचन यदि धैर्य से सह लिए जाएँ, तो संसार की कठोरता भी मनुष्य का कुछ नहीं बिगाड़ सकती।”








