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स्वामी सदानंद के प्रवचनों से—249

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नन्दबाबा बहुत सी सामग्री भेंट करने के लिए साथ लेकर मथुरा आए। वे कंस की राजसभा में आए,कंस को प्रणाम किया,सामग्री आदि भेंट की और विनम्र शब्दों में निवेदन किया,महाराज मेरे घर एक नन्हें बालक ने जन्म लिया हैं,आज उसका छठी उत्सव हैं। आप पधारने का कष्ट करें।
इतनी सारी भेंट देखकर कंस बड़ा खुश हुआ और सहसा मुख से आर्शीवाद निकल गया और बोला, बाबा मुझे बड़ी खुशी हुई यह जानकर कि तुम्हारा आंगन बच्चे की किलकारियों से गूंज उठा है। मैं आर्शीवाद देता हूं कि वह बड़ा होकर महान् राजा बने। दुश्मनों का नाश करें और हर प्रकार से बालक की जय जयकार हो।
कंस को क्या मामूल की कृष्ण ही उसका काल हैं। अत: खुशी के अवसर पर सबको निमन्त्रण दो और सबका आर्शीवाद लो,इसी में भलाई है। अमीरी गरीबी का भेदभाव मत रखो। भगवान् सब में हैं ऐसा जानकर कभी भी गरीब का निरादर मत करो।
गरीब सबकी ओर देखता है,परन्तु गरीब की ओर कोई नहीं देखता। रहिम जी कहते है कि जो दान की तरफ देखता है वास्त में वही दीनबन्धु हैं।
इसी प्रकार जब निमन्त्रण कार्ड भेजो तो प्रथम निमन्त्रण परमात्मा को दो,अपने घर में पूजा का स्थान है, वहाँ जाओ और प्रार्थना करो कि भगवान् आपकी असीम कृपा से ही यह मंगल कार्य निर्विघ्र पूर्ण हो। भक्त नरसिंह जी के सभी कार्य सांवरिया करते थे। जब नानी बाई का भात भरने का निमन्त्रण कार्ड आया तो भक्त ने कार्ड मन्दिर में रख दिया तो स्वयं श्रीकृष्ण भाई बनकर आए, चुन्दड़ी ओढ़ाने और भात भरने।
दूसरा निमन्त्रण गुरूदेव को दो और उनका आर्शीवाद लो। तीसरा पड़ासियो को दो, वे सब मिलकर सहायता करेंगे तो कार्य आसानी से हो जायेगा। चौथा निमन्त्रण अपने मोहल्ले के दादा को दो ताकि कोई विघ्र बाधा न पड़े। पांचवां निमन्त्रण डाक्टर को दो, कोई भ्ी तकलीफ हो जाए तो सहायता करेगा। और छठा पुलिस ऑफिसर को। कोई भी आपत्ति आपे पर मदद मिलेगी।
नन्दबाबा कंस से आशीर्वाद लेकर वसुदेव-देवकी के पास आए। पुत्र जन्म का शुभ समाचार सुनाया। दोनों के आंखों से अश्रुधारा बह निकली,क्योंकि उन्हें अपने पुत्र याद आ गए।
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