धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—838

पुराने समय में एक राज्य के राजा को नई-नई बातें सीखने और ज्ञान प्राप्त करना बहुत अच्छा लगता था। राजा चाहता था कि वह दुनिया की हर अच्छी और उपयोगी बात सीख ले। एक दिन उसने अपने मंत्रियों को बुलाया और कहा, “मेरे लिए एक ऐसे गुरु को खोजो जो मुझे दुनिया का सारा ज्ञान दे सके।”

मंत्री तुरंत काम पर लग गए। कुछ दिनों बाद उन्होंने एक बहुत ही विद्वान और ज्ञानी गुरु को ढूंढ लिया। राजा ने उनका सम्मान किया और उनसे शिक्षा लेना शुरू कर दिया। गुरु रोज राजमहल में आते और राजा को कई महत्वपूर्ण बातें सिखाते।

राजा भी मन लगाकर गुरु की बातें सुनता था। कई महीनों तक ऐसा ही चलता रहा, लेकिन एक दिन राजा को लगा कि उसे कोई खास लाभ नहीं हो रहा है। उसे लगने लगा कि वह उतना ज्ञान प्राप्त नहीं कर पा रहा है, जितनी उसने उम्मीद की थी।

राजा धीरे-धीरे परेशान रहने लगा। एक दिन उसने यह बात रानी को बताई। रानी बहुत समझदार थी। उसने राजा से कहा, “आपको यह बात अपने गुरु से ही पूछनी चाहिए। वही आपको सही कारण बता सकते हैं।”

अगले दिन जब गुरु पढ़ाने आए, तो राजा ने उनसे विनम्रता पूर्वक पूछा, “गुरुदेव, आप मुझे इतने दिनों से शिक्षा दे रहे हैं, लेकिन मुझे उसका पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। कृपया बताइए ऐसा क्यों हो रहा है?”

गुरु मुस्कुराए और बोले, “राजन्, इसका कारण बहुत छोटा है, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण है। आप बहुत बड़े राजा हैं। आपके पास शक्ति, धन और सम्मान सब कुछ है। इसलिए आप अपने सिंहासन पर बैठते हैं और मैं नीचे बैठकर आपको पढ़ाता हूं।”

राजा ध्यान से सुन रहा था।

गुरु ने आगे कहा, “लेकिन गुरु का स्थान हमेशा ऊंचा होता है। जब गुरु नीचे और शिष्य ऊपर बैठता है, तो ज्ञान का प्रवाह सही तरीके से नहीं हो पाता। यही कारण है कि आपको शिक्षा का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।”

राजा को अपनी गलती समझ में आ गई। अगले ही दिन से उसने गुरु के लिए ऊंचा आसन लगवाया और खुद नीचे बैठकर शिक्षा लेने लगा।

अब राजा को गुरु की हर बात समझ आने लगी और उसे पूरा ज्ञान मिलने लगा। इस तरह राजा ने समझ लिया कि गुरु का सम्मान करना बहुत जरूरी होता है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में गुरु का महत्व सबसे अधिक है। गुरु हमें सही और गलत का फर्क समझाते हैं। चाहे वह स्कूल के शिक्षक हों, माता-पिता हों या कोई मार्गदर्शक- हमें उनका सम्मान हमेशा करना चाहिए।

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