कालिंगपोंग के पहाड़ों के बीच श्रीकृष्ण प्रणामी आश्रम है, वहाँ गुरुदेव मंगलदास जी अपने सरल स्वभाव और गहरी दृष्टि के लिए प्रसिद्ध थे। दूर-दूर से लोग उनकी सीख सुनने आते थे।
एक दिन एक युवक भारी मन लेकर उनके पास पहुंचा। बोला— “गुरुदेव, मेरा जीवन समस्याओं से भरा है। मैं जितना भागता हूँ, उतनी ही परेशानियाँ मुझे पकड़ लेती हैं। सकारात्मक रहना चाहता हूँ, पर हो नहीं पाता। क्या करूँ?”
गुरुदेव मुस्कुराए और उसे अपने साथ आश्रम से कुछ दूरी पर ले गए, जहाँ एक बड़ी—सी नदी थी। उन्होंने युवक से कहा— “इस पानी को देखो, क्या दिख रहा है?”
युवक ने कहा— “गुरुदेव, पानी में मेरा प्रतिबिंब तो दिख रहा है, लेकिन लहरों के कारण साफ नहीं दिखाई देता।”
गुरुदेव बोले— “बिल्कुल— जब तक पानी अशांत है, तुम अपनी सच्ची तस्वीर नहीं देख सकते। और जब तक मन अशांत है, तुम वास्तविकता को नहीं समझ सकते।”
गुरुदेव ने कहा— “पॉजिटिविटी का मतलब यह नहीं कि जीवन में कोई कठिनाई न आए।
पॉजिटिविटी का अर्थ है— वास्तविकता को स्वीकार करना, परिस्थितियों को सही रूप में देखना,
और शांत मन से सही दिशा में कदम बढ़ाना।”
युवक ध्यान से सुन रहा था।
गुरुदेव ने आगे कहा— “समस्याएँ तो जीवन में सड़क पर पड़े पत्थर की तरह आती ही रहेंगी। पर अगर मन शांत है, जागरूक है, वास्तविकता को स्वीकार करता है— तो वही पत्थर तुम्हें चोट नहीं पहुंचाते, रास्ता दिखाने वाले चिन्ह बन जाते हैं।”
युवक की आँखों में चमक आ गई। उसने कहा— “गुरुदेव, आज समझ आया— सकारात्मकता किसी कल्पना का नाम नहीं, बल्कि सच्चाई को स्वीकार कर आगे बढ़ने की कला है।”
गुरुदेव मुस्कुराए— “यही जीवन का मूल मंत्र है। जो वास्तविकता को देखता है, वही सकारात्मकता को जीता है।”
इस तरह युवक का दृष्टिकोण बदल गया, और उसी दिन से उसका जीवन भी।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, वास्तविकता से भागना दुख देता है। उसे स्वीकार कर समझना ही शक्ति देता है। शांत मन ही सही दिशा दिखाता है।








