महाराष्ट्र के महान संत एकनाथ जी के जीवन की एक घटना है। एक बार वे अपने शिष्यों के साथ तीर्थ यात्रा पर थे। रास्ते में एक बहुत ऊँचा मंदिर बन रहा था। तपती धूप में एक मजदूर भारी पत्थर ढो रहा था। वह थका हुआ था, चिड़चिड़ा था और बार-बार पत्थरों को कोस रहा था।
संत एकनाथ उसके पास गए और कोमलता से बोले, “हे भाग्यवान! तुम कितने पुण्य का काम कर रहे हो। आने वाली पीढ़ियां जब इस मंदिर में आकर शांति पाएंगी, तो उस शांति की नींव में तुम्हारे पसीने की बूंदें होंगी। तुम्हारी मेहनत साक्षात ईश्वर का घर सजा रही है।”
मजदूर ने सिर उठाकर देखा। जहाँ पहले उसे बोझ महसूस हो रहा था, अब उसे वहां ‘सेवा’ दिखने लगी। उसने अपना पसीना पोंछा और मुस्कुराने लगा। जो पत्थर उसे पहाड़ लग रहे थे, अब वे उसे हल्के लगने लगे। काम वही था, धूप वही थी, लेकिन संत की प्रशंसा के दो शब्दों ने उसकी दृष्टि बदल दी।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब हम प्रशंसा करते हैं, तो व्यक्ति के मन में तीन बड़े बदलाव होते हैं:
दृष्टिकोण का परिवर्तन: व्यक्ति अपने काम को ‘मजबूरी’ के बजाय ‘गर्व’ की नजर से देखने लगता है।
रचनात्मकता का जन्म: भय और आलोचना मस्तिष्क को सिकोड़ देती है, जबकि प्रशंसा उसे नई ऊंचाइयों पर ले जाती है।
सकारात्मकता का चक्र: एक व्यक्ति जिसकी प्रशंसा हुई है, वह दूसरों के प्रति भी दयालु और उदार हो जाता है।
जैसे पौधे को पानी की जरूरत होती है, वैसे ही इंसानी रूह को ‘सराहना’ की। हमारी जुबान से निकला एक मीठा शब्द किसी का पूरा दिन, और शायद पूरा जीवन बदल सकता है।








