धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—834

एक बार एक आश्रम में एक युवक संत के पास आया। उसके मन में बड़ी उलझन थी। उसने संत से कहा, “गुरुदेव, मेरे कई मित्र हैं। कुछ मुझे अच्छे रास्ते पर चलने को कहते हैं और कुछ ऐसे हैं जो मुझे गलत आदतों की ओर ले जाते हैं। मैं समझ नहीं पा रहा कि किसकी बात मानूं?”

संत मुस्कुराए और उसे आश्रम के बगीचे में ले गए। वहाँ दो पौधे लगे थे—एक आम का और दूसरा कंटीली झाड़ी का।

संत ने युवक से कहा, “इन दोनों को ध्यान से देखो। अगर तुम रोज इस आम के पौधे को पानी दोगे, इसकी देखभाल करोगे, तो कुछ वर्षों में यह मीठे फल देगा और सबको आनंद देगा। लेकिन यदि तुम इस कंटीली झाड़ी को बढ़ने दोगे, तो यह पूरे बगीचे में फैलकर कांटे ही कांटे कर देगी।”

युवक ने कहा, “गुरुदेव, यह तो स्वाभाविक है। जो पौधा अच्छा है वही फल देगा, और जो कांटों वाला है वह पीड़ा ही देगा।”

संत ने मुस्कराकर कहा, “ठीक यही बात मित्रता पर भी लागू होती है। अच्छे मित्र आम के पेड़ की तरह होते हैं—वे तुम्हें आगे बढ़ाते हैं, सही रास्ता दिखाते हैं और जीवन को मधुर बनाते हैं।
और बुरे मित्र कंटीली झाड़ी की तरह होते हैं—शुरुआत में छोटे लगते हैं, पर धीरे-धीरे जीवन को कांटों से भर देते हैं।”

फिर संत ने कहा— “मित्र का मार्गदर्शन जीवन को प्रकाशमान भी कर सकता है और अंधकारमयी भी, इसलिए मित्रता सोच-समझकर करनी चाहिए।”

युवक को अपनी उलझन का उत्तर मिल गया। उसने संकल्प लिया कि वह ऐसे मित्रों का साथ चुनेगा जो उसे सत्य, परिश्रम और सदाचार के मार्ग पर ले जाएं।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जैसी संगति होगी, वैसा ही जीवन बनेगा। इसलिए मित्र चुनते समय उनके स्वभाव और मार्ग को अवश्य देखना चाहिए।

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