एक नगर में महंत हरिदास नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह बड़े मंदिर का प्रधान था। उसके प्रवचन सुनने दूर-दूर से लोग आते थे। मंच से वह धर्म, सत्य, दया और सेवा की बातें करता था। लोग उसे संत समझकर सम्मान देते थे।
लेकिन उसकी वास्तविकता कुछ और थी। मंदिर में आने वाले दान का बड़ा हिस्सा वह अपने सुख-सुविधाओं पर खर्च करता था। गरीबों के लिए आए अन्न और वस्त्र भी बेच देता था। जो लोग उसके गलत कामों का विरोध करते, उन्हें वह धर्म का डर दिखाकर चुप करा देता था।
समय बीतता गया। बाहर से उसका सम्मान बढ़ता रहा, लेकिन भीतर उसका लालच भी बढ़ता गया। एक दिन उसने मंदिर के विस्तार के नाम पर लोगों से लाखों रुपये इकट्ठे किए। लोगों ने श्रद्धा से दान दिया, पर वह धन भी उसने अपने निजी कामों में लगा दिया।
कुछ वर्षों बाद परिस्थितियां बदलने लगीं। उसके एक विश्वस्त सहयोगी ने उसके सारे कारनामों के प्रमाण सार्वजनिक कर दिए। नगर के लोगों को सच्चाई पता चल गई। जो लोग कभी उसके चरण छूते थे, वही लोग उससे प्रश्न पूछने लगे। मंदिर समिति ने उसे पद से हटा दिया।
सम्मान खोने का दुख उसे भीतर से तोड़ने लगा। धन तो उसके पास था, लेकिन शांति कहीं नहीं थी। परिवार में कलह बढ़ गई। जिन लोगों के साथ उसने छल किया था, उनकी बद्दुआएं जैसे उसका पीछा कर रही थीं। रातों की नींद गायब हो गई और मन हमेशा भय और पछतावे से घिरा रहने लगा।
एक दिन वह नगर छोड़कर चला गया। रास्ते में उसकी मुलाकात एक वृद्ध साधु से हुई। उसने अपना दुख सुनाया और पूछा, “मैंने इतने वर्षों तक धर्म का प्रचार किया, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?”
साधु मुस्कुराए और बोले, “तुमने धर्म का प्रचार अवश्य किया, लेकिन धर्म का पालन नहीं किया। धर्म के वस्त्र पहन लेने से कोई धार्मिक नहीं बन जाता। ईश्वर को शब्दों से नहीं, कर्मों से मतलब होता है। जो धर्म के नाम पर अधर्म करता है, उसका दंड देर से मिले तो भी निश्चित मिलता है।”
हरिदास की आंखों से आंसू बह निकले। उसे समझ आ गया कि संसार को धोखा देना आसान है, लेकिन अपने कर्मों और ईश्वर के न्याय से कोई नहीं बच सकता।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, धर्म का अर्थ केवल पूजा, प्रवचन या धार्मिक वेशभूषा नहीं है। सच्चा धर्म सत्य, ईमानदारी और करुणा से भरे कर्मों में दिखाई देता है। धर्म के नाम पर अधर्म करने वाला व्यक्ति चाहे कुछ समय तक सम्मान पा ले, लेकिन कर्मों का फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है।








