धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 894

एक समय की बात है, एक गाँव में दो व्यक्ति रहते थे—एक था सरल और विनम्र शिष्य, और दूसरा था स्वयं को बहुत बड़ा ज्ञानी समझने वाला व्यक्ति। गाँव में एक संत आए, जिनका नाम था कबीरदास। उनकी वाणी और ज्ञान दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। दोनों ही व्यक्ति उनके पास ज्ञान प्राप्त करने पहुँचे।

स्वयंभू ज्ञानी व्यक्ति ने संत से कहा, “मुझे सब कुछ आता है, मैं शास्त्रों का ज्ञाता हूँ। बस कुछ ऊँचा ज्ञान दीजिए।”

संत मुस्कुराए और उसे एक कप में चाय डालने को कहा। जब कप भर गया, तब भी संत चाय डालते रहे। चाय बाहर गिरने लगी।

वह व्यक्ति बोला, “महाराज! कप भर चुका है, अब और नहीं समा सकता।”

संत ने शांत स्वर में कहा— “ठीक वैसे ही तुम्हारा मन भी भरा हुआ है—अहंकार और थोथे ज्ञान से। जब तक इसे खाली नहीं करोगे, सच्चा ज्ञान इसमें समा नहीं सकता।”

दूसरा व्यक्ति बहुत ही सरलता से बोला, “मुझे कुछ नहीं आता, कृपया मुझे सिखाइए।” संत ने उसे बैठाया, समझाया, और धीरे-धीरे उसे जीवन के गहरे सत्य सिखाने लगे। कुछ ही समय में वह व्यक्ति न केवल ज्ञानवान बना, बल्कि उसका व्यवहार भी मधुर और संतुलित हो गया।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अज्ञान उतना खतरनाक नहीं होता, क्योंकि उसमें सीखने की गुंजाइश होती है। लेकिन थोथा ज्ञान (आधा-अधूरा ज्ञान) सबसे खतरनाक होता है, क्योंकि वह अहंकार पैदा करता है और सीखने का द्वार बंद कर देता है। “जो व्यक्ति स्वयं को पूर्ण मान लेता है, वह कभी पूर्ण नहीं बन सकता। और जो स्वयं को अधूरा समझता है, वही सच्चा ज्ञानी बनने की राह पर चलता है।”

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Jeewan Aadhar Editor Desk

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