धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—808

समुद्र किनारे एक आश्रम में स्वामी राघवानंद रहते थे। उनका एक शिष्य था, रमन। रमन अक्सर अपनी परेशानियों का रोना रोता रहता था। उसे लगता था कि भगवान ने उसकी ज़िंदगी में बहुत बड़ी-बड़ी मुसीबतें लिख दी हैं।

एक दिन तूफान आने वाला था। समुद्र में ऊंची-ऊंची लहरें उठ रही थीं। रमन डर गया और स्वामी राघवानंद के पास जाकर बोला: “गुरुवर, देखिए समुद्र कितना भयानक हो गया है! लहरें इतनी विशाल हैं कि किसी को भी निगल जाएं। मेरी ज़िंदगी की परेशानियां भी बिल्कुल इन लहरों जैसी हैं—बहुत बड़ी और डरावनी। मैं इनसे कैसे जीतूंगा?”

स्वामी राघवानंद मुस्कुराए और बोले, “रमन, चलो समुद्र किनारे चलते हैं।”

वे दोनों किनारे पर पहुंचे। हवाएं तेज थीं और लहरें उफान पर थीं।

स्वामी राघवानंद ने अपनी झोली से कागज़ की एक छोटी सी नाव निकाली और रमन को दी। उन्होंने कहा, “बेटा, इस नाव को पानी में छोड़ दो।”

रमन ने जैसे ही वह कागज़ की नाव पानी में रखी, एक ही लहर आई और उसे पलट दिया। नाव तुरंत डूब गई और फट गई। रमन बोला, “देखा गुरुवर! मैंने कहा था न, लहरें बहुत शक्तिशाली और बड़ी हैं। बेचारी नाव टिक ही नहीं पाई।”

स्वामी राघवानंद ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने रमन का हाथ पकड़ा और उसे बंदरगाह की तरफ ले गए, जहाँ एक विशालकाय व्यापारी जहाज खड़ा था। वह जहाज लोहे का बना था और कई मंजिला ऊंचा था।

उसी समुद्र में, उन्हीं लहरों के बीच, वह जहाज खड़ा था। लहरें आतीं और जहाज से टकरातीं, लेकिन जहाज को हिला भी नहीं पातीं। लहरें उससे टकराकर खुद ही बिखर जातीं।

स्वामी राघवानंद ने रमन की ओर देखा और पूछा: “रमन, क्या इस जहाज के लिए लहरें छोटी हो गई हैं?”

रमन ने सोचा और कहा, “नहीं गुरुवर, लहरें तो उतनी ही बड़ी हैं जितनी उस कागज़ की नाव के लिए थीं।”

स्वामी राघवानंद ने पूछा, “तो फिर यह जहाज डूब क्यों नहीं रहा? यह डर क्यों नहीं रहा?”

रमन ने उत्तर दिया, “क्योंकि गुरुवर, यह जहाज बहुत बड़ा और मज़बूत है। इसका वजन और आकार इतना ज्यादा है कि लहरें इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं।”

स्वामी राघवानंद ने रमन के कंधे पर हाथ रखा और जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझाया: “बेटा, बिल्कुल यही बात तुम्हारे जीवन पर लागू होती है। समस्याएं (लहरें) कभी छोटी या बड़ी नहीं होतीं। उनका आकार वही रहता है। फर्क सिर्फ इसमें है कि तुम क्या बनकर उनका सामना कर रहे हो।”

उन्होंने आगे कहा: “जब तुम अंदर से कमजोर होते हो (कागज़ की नाव की तरह), तो एक छोटी सी समस्या भी तुम्हें डूबा देती है और तुम्हें लगता है कि समस्या बहुत बड़ी है। लेकिन जब तुम अपने हौसले, ज्ञान और धैर्य को बढ़ा लेते हो (विशाल जहाज की तरह), तो वही बड़ी समस्या तुम्हारे सामने बौनी हो जाती है और तुम उससे टकराकर भी स्थिर रहते हो।”

रमन को अपनी गलती समझ आ गई। उसने समझ लिया कि उसे लहरों (समस्याओं) के शांत होने का इंतज़ार नहीं करना है, बल्कि खुद को एक विशाल जहाज बनाना है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अगर “बोझ” भारी लग रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि बोझ बहुत भारी है; इसका मतलब है कि अभी आपकी “मांसपेशियां” कमज़ोर हैं। एक चींटी के लिए बारिश की एक बूंद ‘बाढ़’ जैसी होती है, लेकिन इंसान के लिए वह कुछ भी नहीं। बूंद वही है, बस आकार बदल गया। ईश्वर से यह मत मांगो कि “मेरी राह आसान कर दो,” बल्कि यह मांगो कि “मेरे कंधे मजबूत कर दो।”

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