एक गुरु अपने शिष्य के साथ पैदल यात्रा कर रहे थे। रास्ता पहाड़ी था और यात्रा कठिन थी। उन्हें संकरी पगडंडियों और गहरी खाइयों से होकर गुजरना पड़ रहा था। चलते-चलते अचानक शिष्य का पैर फिसल गया और वह सीधे एक गहरी खाई की ओर गिरने लगा।
शिष्य ने नीचे गिरते समय एक बांस के पौधे को पकड़ लिया। शिष्य का पूरा वजन उस बांस पर आ गया। बांस बहुत झुक गया, मानो टूट ही जाएगा, लेकिन वह टूटा नहीं। शिष्य हवा में लटक गया।।
गुरु तुरंत आगे बढ़े और किसी तरह शिष्य का हाथ पकड़कर उसे ऊपर खींचने लगे। काफी प्रयास के बाद शिष्य को गुरु ने सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
कुछ देर बाद दोनों आगे बढ़े। गुरु ने शिष्य से पूछा, “क्या तुमने सुना कि उस समय बांस ने क्या कहा था?”
शिष्य ने हैरानी से कहा, “गुरुजी, मैं तो बस अपनी जान बचाने में लगा हुआ था। मुझे तो पेड़-पौधों की भाषा समझ में नहीं आती।”
गुरु मुस्कुराए और बोले, “उस बांस ने तुम्हें जीवन का सबसे बड़ा संदेश दिया है।”
गुरु ने समझाया कि उस कठिन समय में बांस पूरी तरह झुक गया, लेकिन टूटा नहीं। उसने दबाव को स्वीकार किया, विरोध नहीं किया। जब दबाव खत्म हुआ, तो वह फिर से सीधा हो गया।
गुरु ने बताया कि बांस हमें सीख देता है कि हमें जीवन में लचीलापन और विनम्रता बनाए रखनी चाहिए। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में कठोर बना रहता है, वह टूट जाता है, लेकिन जो व्यक्ति समय के अनुसार खुद को ढाल लेता है, वह हर संकट से बच जाता है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में बदलाव को स्वीकार करना चाहिए। सुख और दुख दोनों अस्थायी हैं। जब हम यह समझ लेते हैं कि हर स्थिति बदलती है, तो हम अनावश्यक तनाव से बच जाते हैं। स्वीकार करने का अर्थ हार मानना नहीं, बल्कि वास्तविकता को समझकर सही निर्णय लेना है।








