एक व्यक्ति वर्षों से परेशान था। व्यापार में घाटा, घर में कलह, मन में बेचैनी। उसने सोचा—“शायद मेरी पूजा में कमी है।” वह एक मंदिर गया, फिर दूसरे, फिर तीसरे। कभी धन की देवी के आगे सिर झुकाया, कभी शिवालय में जल चढ़ाया, कभी तीर्थों की यात्राएं कीं।
हर जगह उसकी एक ही प्रार्थना होती— “भगवान, मेरी मनोकामना पूरी कर दो।” लेकिन समय बीतता गया, उसकी इच्छाएं पूरी नहीं हुईं। धीरे—धीरे उसके मन में शिकायत भरने लगी। एक दिन वह एक संत के पास पहुंचा। आंखों में थकान थी, आवाज में निराशा।
उसने कहा— “महाराज, मैं न जाने कितने देवी—देवताओं के मंदिरों में गया। हर जगह माथा टेका, दान दिया, पूजा की… लेकिन कोई मेरी मनोकामना पूरी नहीं कर रहा। अब मैं क्या करूं?”
संत मुस्कुराए। उन्होंने उस व्यक्ति को अपने साथ आश्रम के पीछे लगे आम के पेड़ के पास ले गए। पेड़ पर ढेरों कच्चे और पके आम लगे थे।
संत ने पूछा— “तुम्हें आम चाहिए?”
व्यक्ति बोला— “जी महाराज।”
संत ने कहा—“तो पेड़ से मांगो।”
वह व्यक्ति पेड़ के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया—
“हे पेड़, मुझे एक मीठा आम दे दो।”
कुछ देर बीती… कोई आम नहीं गिरा।
वह फिर बोला— “हे पेड़, मैं बहुत दुखी हूं, कृपा करके मुझे आम दे दो।”
लेकिन कुछ नहीं हुआ। संत शांत खड़े देखते रहे। थोड़ी देर बाद व्यक्ति झुंझलाकर बोला— “महाराज, ऐसे मांगने से आम कहां मिलेगा?”
संत ने पूछा— “तो फिर कैसे मिलेगा?”
व्यक्ति बोला—“पेड़ पर चढ़ना पड़ेगा, हाथ बढ़ाना पड़ेगा, तब जाकर आम मिलेगा।”
संत मुस्कुराए और बोले— “यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है।” व्यक्ति हैरान होकर देखने लगा।
संत बोले— “तुम मंदिर—मंदिर जाकर केवल मांगते रहे, लेकिन अपने जीवन के पेड़ पर चढ़ने का प्रयास नहीं किया। भगवान फल देने से पहले कर्म करने की शक्ति देते हैं। प्रार्थना रास्ता दिखाती है, लेकिन मंजिल तक कदम तुम्हें ही बढ़ाने पड़ते हैं।”
उन्होंने आगे कहा— “अगर किसान केवल मंदिर में बैठकर अच्छी फसल की प्रार्थना करे, लेकिन खेत में बीज न बोए, तो क्या होगा? अगर विद्यार्थी केवल भगवान से पास होने की प्रार्थना करे, लेकिन पढ़ाई न करे, तो क्या वह सफल होगा?” व्यक्ति की आंखें झुक गईं। उसे समझ आ गया कि वह केवल चमत्कार चाहता था, प्रयास नहीं।
संत ने अंतिम बात कही— “भगवान कभी खाली हाथ नहीं लौटाते। वे या तो मनोकामना पूरी करते हैं…या मनुष्य को इतना मजबूत बना देते हैं कि वह अपनी मनोकामना स्वयं पूरी कर सके।”
उस दिन के बाद उस व्यक्ति ने शिकायत छोड़ दी। वह रोज प्रार्थना भी करता, और पूरे मन से कर्म भी। कुछ समय बाद उसके जीवन की परिस्थितियां बदलने लगीं। तब उसे समझ आया— मंदिरों के चक्कर लगाने से अधिक जरूरी है, अपने भीतर की शक्ति को जगाना।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हमें अपने कर्म का ही फल मिलता है। मंदिर और प्रार्थना केवल हमारा मानसिक साथ देते है। शारीरिक श्रम हमें स्वयं करना होगा। यदि शारीरिक श्रम होगा तभी प्रार्थना मंजूर होती है।








