एक बार अयोध्या में राजतिलक की तैयारियाँ चल रही थीं। पूरा नगर दीपों से सज चुका था। हर ओर खुशी का माहौल था, क्योंकि अगले दिन श्रीराम राजा बनने वाले थे। लेकिन रात होते-होते सब बदल गया।
महारानी कैकेयी ने राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांग लिए— पहला, भरत राजा बनें। दूसरा, राम को 14 वर्ष का वनवास दिया जाए। यह सुनकर महल में सन्नाटा छा गया। दशरथ टूट चुके थे। मंत्री परेशान थे। प्रजा रो रही थी। सबको लगा कि राम क्रोधित होंगे, विरोध करेंगे या सिंहासन के लिए संघर्ष करेंगे। लेकिन राम मुस्कुराए और बोले— “पिता का वचन ही मेरे लिए सबसे बड़ा धर्म है।” उन्होंने बिना किसी बहस के राजसी वस्त्र उतार दिए और वन जाने की तैयारी करने लगे।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, श्रीराम के जीवन की इस कथा से शिक्षा मिलती है कि परिस्थिति बदल जाए, पर चरित्र नहीं बदलना चाहिए। आज के समय में जब किसी व्यक्ति का प्रमोशन रुक जाता है या व्यापार में नुकसान हो जाता है, तो वह तनाव, गुस्से और शिकायतों में घिर जाता है। लेकिन राम ने सिखाया कि संकट में शांत रहना ही सबसे बड़ी ताकत है।
वन जाते समय लक्ष्मण और सीता भी उनके साथ चल पड़े। राम ने कभी यह नहीं कहा कि “मैं अकेला सब कर लूंगा।” वन में उन्होंने हर व्यक्ति का सम्मान किया—चाहे वह निषादराज हो, शबरी हो या वानर सेना।
फिर उनकी मुलाकात हनुमान से हुई। राम ने पहली मुलाकात में ही हनुमान की क्षमता पहचान ली।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, इस प्रसंग से प्रेरणा मिलती है कि सही व्यक्ति की पहचान सफलता दिलाती है। हर संगठन में कुछ लोग साधारण दिखते हैं, लेकिन उनमें असाधारण क्षमता होती है। अच्छा लीडर वही होता है जो उस प्रतिभा को पहचान सके।
जब माता सीता का हरण हुआ, तब राम दुखी जरूर हुए, लेकिन उन्होंने बिना सोचे-समझे युद्ध शुरू नहीं किया। उन्होंने पहले जानकारी जुटाई, मित्र बनाए, रणनीति तैयार की और फिर आगे बढ़े। उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की। विभीषण को शरण दी, जबकि वह शत्रु पक्ष से आया था।
लोगों ने कहा— “दुश्मन के भाई पर कैसे भरोसा कर सकते हैं?”
राम बोले— “जो सत्य और धर्म के साथ हो, वह अपना है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, श्रीराम के प्रसंग से पता चलता है कि निर्णय व्यक्ति देखकर नहीं, नीयत देखकर लो। व्यापार और जीवन में कई बार सही लोग गलत परिस्थितियों में मिलते हैं। समझदार व्यक्ति अवसर और इंसान दोनों की पहचान करता है।








