बहुत समय पहले एक राजा को अपने ऐश्वर्य पर बहुत घमंड था। अपने जन्मदिन के अवसर पर उसने घोषणा की कि वह किसी एक व्यक्ति की सारी इच्छाएं पूरी करेगा। वह स्वयं को भगवान जैसा महसूस करना चाहता था। राजमहल में भव्य समारोह आयोजित हुआ। दूर-दूर से लोग राजा को शुभकामनाएं देने पहुंचे। उसी भीड़ में एक साधु भी आए। उनके चेहरे पर अद्भुत शांति और संतोष झलक रहा था।
राजा ने साधु का सम्मान करते हुए कहा, “महाराज, आज मैं आपकी हर इच्छा पूरी करना चाहता हूं। जो चाहें मांग लीजिए।”
साधु मुस्कराए और बोले, “राजन्, मुझे किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है। मैं पूर्ण हूं और अपने जीवन में संतुष्ट हूं।”
राजा को यह उत्तर पसंद नहीं आया। उसने बार-बार आग्रह किया। अंततः साधु ने कहा, “यदि आप इतना ही चाहते हैं तो मेरे इस छोटे से पात्र को सोने के सिक्कों से भर दीजिए।”
राजा हंस पड़ा। उसे लगा यह तो बहुत छोटा काम है। उसने संत के पात्र में सोने के सिक्के डलवाने शुरू किए, लेकिन जैसे ही सिक्के पात्र में गिरते, वे गायब हो जाते। पात्र खाली का खाली रह जाता।
राजा ने और सिक्के डलवाए। फिर और। धीरे-धीरे उसने अपना पूरा खजाना उस पात्र में उड़ेल दिया, लेकिन पात्र फिर भी नहीं भरा।
हैरान राजा साधु के चरणों में गिर पड़ा और बोला, “महाराज, यह कैसा पात्र है जो भरता ही नहीं?”
साधु मुस्कराए और बोले, “राजन्, यह पात्र मनुष्य के मन का प्रतीक है। मन की इच्छाएं कभी समाप्त नहीं होतीं। धन, पद, प्रतिष्ठा और सत्ता पाने के बाद भी मन और अधिक चाहता है। जब तक मन में संतोष नहीं होगा, तब तक यह पात्र कभी नहीं भरेगा।”
उस दिन राजा का अहंकार टूट गया और उसे समझ आ गया कि सच्ची समृद्धि बाहरी धन में नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष में है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, संतोष का अर्थ महत्वाकांक्षा छोड़ देना नहीं है, बल्कि जो उपलब्ध है उसके लिए आभार व्यक्त करना है। प्रतिदिन अपनी चीजों, उपलब्धियों और खुशियों से संतुष्ट रहने की आदत बनाएं।








