पुराने समय में एक आश्रम में एक संत अपने शिष्यों के साथ रहते थे। गुरु अपने ज्ञान की वजह से दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। सभी शिष्य उनका बहुत सम्मान करते थे और उनकी हर बात को ध्यान से सुनते थे। आश्रम में अनुशासन था।
एक दिन आश्रम में एक नया शिष्य आया। उसने देखा कि सभी लोग गुरु का आदर करते हैं। जहां भी गुरु जाते, शिष्य उनके पीछे चलते और उनकी बातों को जीवन में उतारने का प्रयास करते। यह देखकर नए शिष्य के मन में भी ऐसा सम्मान पाने की इच्छा जाग उठी।
कुछ दिनों बाद वह गुरु के पास गया और बोला, “गुरुदेव, मैं भी आपकी तरह महान गुरु बनना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि मेरे भी अनेक शिष्य हों और लोग मुझे भी उतना ही सम्मान दें जितना आपको देते हैं।”
गुरु मुस्कुराए और बोले, “पुत्र, यह लक्ष्य अच्छा है, लेकिन इसके लिए तुम्हें वर्षों तक अध्ययन करना होगा, अनुभव प्राप्त करना होगा, धैर्य रखना होगा और निरंतर मेहनत करनी होगी। तभी तुम इस योग्य बन पाओगे कि दूसरों का मार्गदर्शन कर सको।”
शिष्य ने अधीरता से पूछा, “लेकिन गुरुदेव, मैं अभी से गुरु क्यों नहीं बन सकता? मैं आज से ही लोगों को ज्ञान देना शुरू कर सकता हूं।”
गुरु ने कोई सीधा उत्तर नहीं दिया। उन्होंने शिष्य को अपने सामने खड़े होने के लिए कहा। फिर स्वयं एक ऊंचे तख्त पर चढ़ गए और बोले, “मुझे इस तख्त से भी ऊपर पहुंचा दो।”
शिष्य आश्चर्यचकित होकर बोला, “गुरुदेव, मैं तो स्वयं नीचे खड़ा हूं। मैं आपको ऊपर कैसे पहुंचा सकता हूं? इसके लिए तो मुझे भी पहले ऊपर आना होगा।”
गुरु हंस पड़े और बोले, “यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। जो व्यक्ति स्वयं ऊंचाई पर नहीं पहुंचा, वह दूसरों को ऊंचाई तक नहीं पहुंचा सकता। यदि तुम्हें लोगों का मार्गदर्शन करना है, तो पहले स्वयं को योग्य बनाना होगा। ज्ञान, अनुभव, समझ और चरित्र की ऊंचाई हासिल करनी होगी। तभी लोग तुम्हारी बातों पर विश्वास करेंगे।”
गुरु की बात सुनकर शिष्य को अपनी गलती समझ आ गई। उसने निश्चय किया कि वह जल्दबाजी छोड़कर पहले स्वयं को बेहतर बनाएगा। उस दिन उसे सफलता का सबसे महत्वपूर्ण रहस्य समझ में आ गया, लक्ष्य पाने से पहले खुद को उसके योग्य बनाना जरूरी है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, हर बड़ा लक्ष्य विशेष कौशल और ज्ञान की मांग करता है। यदि हम किसी पद, सफलता या उपलब्धि को पाना चाहते हैं, तो पहले यह समझना होगा कि उसके लिए किन योग्यताओं की आवश्यकता है।








