एक गाँव में एक संत रहते थे। उनके पास हर दिन लोग अपनी शिकायतें लेकर आते। कोई कहता, “उसने मेरा अपमान किया”, कोई कहता, “मेरी बात का गलत अर्थ निकाल लिया।” एक दिन एक युवक संत के पास आया। वह बहुत दुखी था। उसने कहा, “गुरुदेव, मैं तो मजाक में बातें करता हूँ, किसी का बुरा नहीं चाहता, फिर भी लोग मेरी हर बात को दिल से लगा लेते हैं। मेरे खिलाफ बातें बनाते हैं।” संत मुस्कुराए और उसे तालाब के किनारे ले गए। उन्होंने एक पत्थर उठाकर पानी में फेंका। लहरें दूर तक फैल गईं।
संत बोले, “यह पत्थर तेरे शब्द हैं। एक बार मुंह से निकल गए तो उनकी लहरें कहाँ तक जाएँगी, यह तेरे हाथ में नहीं रहता।”
फिर संत ने युवक से कहा, “अब इन लहरों को वापस रोककर दिखा।”
युवक बोला, “यह तो असंभव है।”
संत ने कहा, “ठीक वैसे ही, कई बार तेरी हँसी में कही बात किसी के मन का घाव बन जाती है। और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो बिना कारण बातों को हथियार बना लेते हैं।”
युवक ने पूछा, “तो क्या हर समय बोलना छोड़ दूँ?”
संत ने उत्तर दिया, “नहीं, पर इतना अवश्य सीख ले कि जहाँ लोग तेरे शब्दों की कीमत नहीं समझते, वहाँ मौन सबसे बड़ा उत्तर है। तू किसी का बुरा नहीं सोचता, यह तेरी अच्छाई है; लेकिन संसार में हर चेहरा वैसा नहीं होता जैसा दिखाई देता है। बहुत से लोग मुस्कुराते हैं, पर उनके मन में ईर्ष्या और स्वार्थ छिपा होता है।”
फिर संत ने एक वाक्य कहा, जिसे सुनकर युवक की आँखें भर आईं— “चुप रहकर, चुप में ही तेरी भलाई है। तेरी मजाक में कही बात भी लोगों ने दिलों से लगाई है। तू किसी का बुरा नहीं सोचता, लेकिन यहाँ हर मुस्कुराता चेहरा सच्चा नहीं होता। कई लोग बाहर से उजले और भीतर से काले होते हैं। यही दुनिया की सच्चाई है। इसलिए अपने स्वभाव की अच्छाई मत छोड़, पर अपनी हर बात हर किसी के सामने मत खोल।”
उस दिन के बाद युवक ने एक बात गाँठ बाँध ली—हर प्रश्न का उत्तर शब्द नहीं होते, कई बार मौन ही सबसे बड़ा ज्ञान और सबसे बड़ी सुरक्षा होता है।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “जीवन में हर व्यक्ति को अपनी बात साबित करने की आवश्यकता नहीं होती। जहाँ लोग समझने के बजाय गलत समझने को तैयार बैठे हों, वहाँ मौन, विवाद से अधिक बुद्धिमानी का परिचय देता है।”








