चंद्रदेव और प्रजापति दक्ष से जुड़ी पौराणिक कथा है। कथा के मुताबिक, प्रजापति दक्ष की 27 कन्याएं थीं। उन्होंने अपनी इन 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रदेव से किया था। स्वाभाविक रूप से अपेक्षा थी कि चंद्र अपनी सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करेंगे और सभी को बराबर सम्मान, प्रेम देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
चंद्रदेव अपनी पत्नी रोहिणी से विशेष प्रेम करते थे। वे अधिकतर समय उसी के साथ बिताते और अन्य 26 पत्नियों की उपेक्षा करते थे। धीरे-धीरे यह भेदभाव सभी 26 पत्नियों को खटकने लगा। दुखी होकर चंद्रदेव की 26 पत्नियां अपने पिता दक्ष प्रजापति के पास पहुंचीं और अपना दुख व्यक्त किया।
दक्ष प्रजापति ने चंद्रदेव को बुलाकर समझाया कि एक पति के लिए भी उसकी सभी पत्नियां समान होनी चाहिए। उन्होंने चंद्र से भेदभाव छोड़कर सबके साथ समान व्यवहार करने को कहा। चंद्रदेव ने उस समय तो उनकी बात मान ली, लेकिन व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं किया।
कुछ समय बाद स्थिति फिर वैसी ही हो गई। उपेक्षित पत्नियों ने दोबारा अपने पिता से शिकायत की। इस बार दक्ष प्रजापति अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने चंद्रदेव को शाप दे दिया कि उन्हें क्षय रोग हो जाए। शाप के प्रभाव से चंद्रदेव गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उनकी स्थिति देखकर देवताओं में चिंता फैल गई।
सभी देवता ब्रह्माजी के पास पहुंचे और समाधान पूछा। ब्रह्माजी ने बताया कि चंद्रदेव को प्रभास क्षेत्र में जाकर भगवान शिव की आराधना करनी चाहिए और महामृत्युंजय मंत्र का जप करना चाहिए। चंद्रदेव ने पूरी श्रद्धा और निष्ठा से तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए।
शिवजी ने चंद्रदेव को रोग से मुक्ति का वरदान दिया, लेकिन साथ ही यह व्यवस्था भी बनाई कि एक पक्ष में उनकी कलाएं क्षीण होंगी और दूसरे पक्ष में बढ़ेंगी। तभी से चंद्रमा शुक्ल पक्ष में बढ़ता और कृष्ण पक्ष में घटता दिखाई देता है।
यह कथा केवल धार्मिक प्रसंग नहीं है, बल्कि रिश्तों में समानता, सम्मान और न्याय का गहरा संदेश भी देती है। भेदभाव चाहे परिवार में हो, कार्यस्थल पर हो या समाज में, वह अंततः तनाव, असंतोष और संघर्ष को जन्म देता है। इसलिए कभी भी भेदभाव नहीं करना चाहिए।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, परिवार में किसी एक व्यक्ति को अत्यधिक महत्व देना और दूसरों की अनदेखी करना असंतोष पैदा करता है। हर सदस्य को सम्मान और महत्व मिलना चाहिए।








