एक गांव में दो व्यापारी रहते थे। पहला व्यापारी बहुत धनवान था, लेकिन उसे अपने धन का घमंड था। वह लोगों से कठोर शब्दों में बात करता था और स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझता था। दूसरा व्यापारी साधारण स्थिति का था, परंतु उसकी वाणी मधुर थी और वह सभी के साथ विनम्रता से पेश आता था।
एक दिन गांव में एक संत आए। दोनों व्यापारी संत के दर्शन करने पहुंचे। पहले व्यापारी ने बड़े अभिमान से कहा, “महाराज! मेरे पास अपार धन-संपत्ति है, पूरे गांव में मेरी बराबरी कोई नहीं कर सकता।”
संत मुस्कुराए, लेकिन कुछ नहीं बोले।
फिर दूसरे व्यापारी ने संत के चरण स्पर्श किए और विनम्रता से कहा, “महाराज! ईश्वर की कृपा से जो मिला है, उसी में संतुष्ट हूं। कृपया मुझे सदैव अच्छा आचरण करने का आशीर्वाद दें।”
संत ने उसे आशीर्वाद दिया।
कुछ दिनों बाद संत ने दोनों व्यापारियों को बुलाया और एक प्रश्न पूछा, “यदि किसी बगीचे में एक वृक्ष फलों से लदा हो और दूसरा सूखा खड़ा हो, तो लोग किस वृक्ष के पास जाएंगे?”
दोनों ने उत्तर दिया, “फलदार वृक्ष के पास।”
संत बोले, “क्योंकि वह झुकना जानता है। जिस वृक्ष पर जितने अधिक फल लगते हैं, वह उतना ही अधिक विनम्र हो जाता है। सूखा वृक्ष अकड़कर खड़ा रहता है, लेकिन किसी के काम नहीं आता।”
फिर संत ने कहा, “मनुष्य भी ऐसा ही है। धन, ज्ञान, पद या शक्ति से नहीं, बल्कि विनम्रता और मधुर वाणी से लोगों के हृदय में स्थान बनता है। कठोर शब्द लोगों को दूर कर देते हैं, जबकि प्रेम और सम्मान से बोले गए शब्द अपरिचित को भी अपना बना लेते हैं।”
पहले व्यापारी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने संत से क्षमा मांगी और अपने व्यवहार में परिवर्तन लाने का संकल्प लिया।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “समाज में वही लोग सबसे अधिक प्रिय होते हैं, जो विनम्र स्वभाव के होते हैं और जिनकी वाणी मधुर होती है। मधुर बोल और नम्र व्यवहार किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी हैं।”








