एक गाँव में एक वृद्ध संत रहते थे। उनके पास जीवन की समस्याओं का समाधान पूछने दूर-दूर से लोग आते थे।
एक दिन दो मित्र संत के पास पहुँचे। पहला बोला, “गुरुदेव, मुझे हर व्यक्ति पर संदेह रहता है। मुझे लगता है कि कोई न कोई मुझे धोखा देगा। इस कारण मेरे अपने भी मुझसे दूर हो गए हैं।”
दूसरा बोला, “गुरुदेव, मैं तो हर किसी पर आँख बंद करके विश्वास कर लेता हूँ। लोगों ने कई बार मेरा भरोसा तोड़ा, धन का नुकसान कराया और मेरा दिल भी दुखाया।”
संत मुस्कुराए और दोनों को अपने साथ बगीचे में ले गए। वहाँ एक माली पौधों को पानी दे रहा था।
संत ने पूछा, “यदि यह माली इस डर से पौधों को बिल्कुल पानी न दे कि कहीं जड़ें सड़ न जाएँ, तो क्या होगा?”
दोनों बोले, “पौधे सूख जाएँगे।”
संत ने फिर पूछा, “और यदि यह दिन-रात इतना पानी देता रहे कि मिट्टी ही दलदल बन जाए?”
दोनों ने उत्तर दिया, “तब भी पौधे नष्ट हो जाएँगे।”
संत ने कहा,”यही नियम रिश्तों का भी है। अत्यधिक संदेह रिश्तों को सूखा देता है और अंधविश्वास उन्हें सड़ा देता है। दोनों ही स्थितियाँ नुकसान पहुँचाती हैं।”
फिर संत ने समझाया, “विश्वास अवश्य करो, लेकिन विवेक के साथ। और यदि कभी संदेह हो, तो पहले संवाद करो, अनुमान मत लगाओ। जहाँ विश्वास और सावधानी साथ चलते हैं, वहाँ रिश्ते भी सुरक्षित रहते हैं और मन भी शांत रहता है।”
दोनों मित्रों को अपनी भूल समझ आ गई। एक ने हर बात पर शक करना छोड़ दिया, तो दूसरे ने बिना परखे किसी पर भरोसा करना छोड़ दिया। कुछ समय बाद दोनों के जीवन में फिर से सुख, सम्मान और अच्छे संबंध लौट आए।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी,”अत्यधिक संदेह रिश्तों को तोड़ देता है और अत्यधिक विश्वास हमें चोट पहुँचा सकता है। जीवन में विश्वास और विवेक का संतुलन ही सबसे बड़ी समझदारी है।”








