बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गाँव में मोहन नाम का एक मेहनती और ईमानदार युवक रहता था। वह अपने माता-पिता की सेवा करता, सभी का सम्मान करता और अपने काम से काम रखता था। लेकिन गाँव के कुछ लोग उसकी सादगी और चुप रहने की आदत का मज़ाक उड़ाते थे। कोई उसे निकम्मा कहता, कोई उसे कमजोर समझता और कोई उसकी गरीबी का ताना देता।
मोहन इन बातों से बहुत दुखी रहता था। कई बार उसका मन करता कि वह भी उन लोगों को करारा जवाब दे, लेकिन उसके संस्कार उसे ऐसा करने से रोक देते। फिर भी भीतर ही भीतर उसका मन टूटने लगा था।
एक दिन उसने सुना कि पास के जंगल में एक संत का आश्रम है, जहाँ दूर-दूर से लोग अपनी समस्याओं का समाधान पाने आते हैं। वह भी संत के पास पहुँच गया और उनके चरणों में बैठकर बोला—
“गुरुदेव! मैं किसी का बुरा नहीं करता, फिर भी लोग मेरा अपमान करते हैं। मेरी अच्छाइयों को कोई नहीं देखता। जब वे मुझे ताने देते हैं, तो बहुत क्रोध आता है। बताइए, मैं क्या करूँ?”
संत मुस्कुराए और बोले, “बेटा, पहले मेरे साथ चलो।”
वे दोनों आश्रम के पीछे स्थित पहाड़ी की ओर गए। वहाँ संत ने मिट्टी में दबा एक चमकीला पत्थर निकाला और मोहन के हाथ में देते हुए कहा, “इसे लेकर पहले गाँव के सब्ज़ी बेचने वाले के पास जाओ। उससे इसकी कीमत पूछना, लेकिन बेचना मत।”
मोहन सब्ज़ी वाले के पास गया। उसने पत्थर को देखा और हँसते हुए बोला, “यह तो काँच जैसा लगता है। अगर चाहो तो इसके बदले दो किलो आलू दे सकता हूँ।”
मोहन वापस संत के पास आया। संत ने कहा, “अब इसे कपड़े के व्यापारी के पास ले जाओ।”
व्यापारी ने पत्थर को देखा और बोला, “यह सजावट के काम आ सकता है। मैं इसके पाँच सौ रुपये दे दूँगा।”
संत ने फिर कहा, “अब इसे शहर के सबसे प्रसिद्ध जौहरी के पास ले जाओ।”
मोहन जब जौहरी के पास पहुँचा, तो जौहरी ने पत्थर को देखते ही अपनी सीट छोड़ दी। उसने विशेष लेंस से उसे परखा और आश्चर्यचकित होकर बोला—
“बेटा! यह साधारण पत्थर नहीं, बल्कि बहुत ही दुर्लभ और अनमोल हीरा है। इसकी कीमत लाखों नहीं, करोड़ों रुपये हो सकती है। यदि तुम इसे बेचना चाहो, तो मैं अपनी पूरी दुकान भी इसके बदले दे सकता हूँ।”
मोहन यह सुनकर स्तब्ध रह गया। वह तुरंत संत के पास लौटा और सारी बात बता दी।
संत ने प्रेम से कहा, “बेटा, यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। एक ही हीरे की कीमत तीन लोगों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार लगाई। सब्ज़ी वाले के लिए वह आलू के बराबर था, व्यापारी के लिए कुछ सौ रुपये का, लेकिन जौहरी उसकी असली पहचान जानता था।”
मोहन ध्यान से सुनता रहा।
संत आगे बोले, “जीवन में भी ऐसा ही होता है। हर व्यक्ति आपकी योग्यता, आपके चरित्र और आपके मूल्य को नहीं पहचान सकता। जो जितनी समझ रखता है, वह उतनी ही कीमत लगाता है। इसलिए अज्ञानियों के तानों पर क्रोध करना बुद्धिमानी नहीं है।”
“यदि हीरा हर उस व्यक्ति से लड़ने लगे जो उसे काँच कहे, तो वह अपनी चमक खो देगा। हीरे का काम अपनी कीमत साबित करना नहीं, बल्कि अपनी चमक बनाए रखना है। जब वह सही जौहरी के हाथ में पहुँचता है, तब उसकी असली पहचान स्वयं हो जाती है।”
मोहन की आँखों में आँसू आ गए। उसने संत के चरणों में सिर झुकाकर कहा, “गुरुदेव! आज मुझे समझ आ गया कि लोगों की बातों से नहीं, अपने कर्मों से अपनी पहचान बनानी चाहिए।”
संत ने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा, “बेटा, संसार में हर किसी को प्रसन्न करना संभव नहीं है। इसलिए अपने अच्छे कर्म करते रहो, विनम्र बने रहो और ईश्वर पर विश्वास रखो। समय सबसे बड़ा जौहरी है। वह एक दिन प्रत्येक व्यक्ति की वास्तविक कीमत संसार को अवश्य बता देता है।”
उस दिन के बाद मोहन ने कभी किसी के तानों का उत्तर क्रोध से नहीं दिया। वह पहले से भी अधिक लगन और ईमानदारी से अपना कार्य करता रहा। कुछ वर्षों बाद वही लोग, जो कभी उसका मज़ाक उड़ाते थे, उसकी सफलता और सम्मान देखकर उसकी प्रशंसा करने लगे।
तब मोहन को संत के वे शब्द याद आए— “लोगों के तानों पर गुस्सा नहीं करना चाहिए, क्योंकि अंजान लोगों के लिए तो हीरा भी काँच का होता है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अपनी कीमत दूसरों की राय से नहीं, अपने गुणों और कर्मों से तय होती है। अज्ञानियों की आलोचना पर क्रोध नहीं, धैर्य रखना चाहिए। सही समय और सही व्यक्ति आपकी वास्तविक पहचान अवश्य करेगा। हीरे को अपनी चमक सिद्ध नहीं करनी पड़ती; उसकी पहचान स्वयं बोलती है।








