एक व्यक्ति अपने परिवार के रोज-रोज के झगड़ों से बहुत परेशान रहता था। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते थे। धीरे-धीरे वह इतना दुखी हो गया कि उसे लगा अब संसार में उसके लिए कुछ भी नहीं बचा है। उसने निश्चय किया कि वह सब कुछ छोड़कर संन्यास ले लेगा और भगवान की भक्ति में जीवन व्यतीत करेगा।
एक दिन वह बिना किसी को बताए घर छोड़कर जंगल की ओर निकल पड़ा। कई घंटे चलने के बाद उसे एक आश्रम दिखाई दिया। आश्रम के बाहर एक विशाल वृक्ष के नीचे एक संत गहरी साधना में लीन थे। वह व्यक्ति चुपचाप उनके सामने बैठ गया और उनके ध्यान समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगा।
कुछ समय बाद संत ने अपनी आंखें खोलीं। व्यक्ति ने उनके चरणों में प्रणाम किया और विनम्रता से कहा, “गुरुदेव, मुझे अपनी शरण में ले लीजिए। मैं संसार का त्याग करके भगवान की भक्ति करना चाहता हूं। मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।”
संत ने मुस्कुराते हुए उससे पूछा, “बताओ, क्या तुम अपने परिवार में किसी से प्रेम करते हो?”
व्यक्ति ने तुरंत उत्तर दिया, “नहीं। मैं अपने माता-पिता, पत्नी, बच्चों या किसी भी रिश्तेदार से प्रेम नहीं करता। यह दुनिया स्वार्थ से भरी है। अब मुझे किसी से कोई लगाव नहीं रहा।”
संत कुछ क्षण शांत रहे, फिर बोले, “पुत्र, मुझे क्षमा करना। मैं तुम्हें अपना शिष्य नहीं बना सकता।”
यह सुनकर व्यक्ति आश्चर्यचकित रह गया। उसने पूछा, “गुरुदेव, ऐसा क्यों?”
संत ने बड़े शांत स्वर में कहा, “यदि तुम्हारे मन में अपने परिवार के लिए थोड़ा-सा भी प्रेम होता, तो मैं उसी प्रेम को विस्तार देकर तुम्हारा मन भगवान की ओर लगा सकता था। प्रेम का एक छोटा-सा बीज ही आगे चलकर विशाल वृक्ष बनता है, लेकिन जब मन पूरी तरह कठोर हो जाए, उसमें प्रेम, स्नेह, करुणा और अपनापन ही न बचे, तो भक्ति का पौधा कैसे उगेगा? पत्थर से पानी का झरना नहीं फूट सकता।”
संत की बात सुनकर उस व्यक्ति की आंखें खुल गईं। उसे समझ में आ गया कि सच्चा त्याग घर छोड़ने में नहीं, बल्कि मन में प्रेम, धैर्य और करुणा विकसित करने में है। उसी दिन उसने अपने भीतर बदलाव लाने का संकल्प लिया।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, समस्याओं से भागना समाधान नहीं है। घर में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन उनका समाधान संवाद, धैर्य और समझदारी से निकाला जा सकता है। कठिन परिस्थितियों से दूर भागने के बजाय उनका सामना करना चाहिए।








