धर्म

परमहंस संत शिरोमणि डा. स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 732

एक समय की बात है। हिमालय के पास एक छोटा-सा आश्रम था, जहाँ संत सदानंद रहते थे। दूर-दूर से लोग उनकी वाणी सुनने आते, क्योंकि वे कम बोलते थे, लेकिन जो भी बोलते थे, वह जीवन बदल देने वाला होता।

एक दिन आश्रम में एक युवक आया। चेहरा थका हुआ, मन भारी, और आँखों में कई प्रश्न थे। उसने संत से कहा— “गुरुदेव, मैंने जीवन में बहुत मेहनत की, पर फल उतना नहीं मिला। लोग कहते हैं शुभ कर्म करो, लेकिन क्या सच में प्रकृति उसके बदले कुछ देती है?”

संत मुस्कुराए। उन्होंने युवक को अपने साथ जंगल की ओर चलने को कहा।

थोड़ी दूर चलने के बाद संत ने देखा कि रास्ते के किनारे एक छोटा-सा घायल पंछी पड़ा है। संत ने तुरंत अपना कमंडल खोला, पानी की कुछ बूंदें पंछी की चोंच में डालीं, और पास के पेड़ से कुछ पत्ते लेकर उसके घाव पर रख दिए। उन्होंने उसे सुरक्षित घास में रख दिया ताकि कोई जानवर उसे नुकसान न पहुँचाए।

युवक ने यह सब देखा और बोला— “गुरुदेव, इतनी छोटी-सी सहायता का क्या अर्थ? यह तो आपके समय की बर्बादी है।”

संत ने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराते हुए आगे बढ़ गए।

कुछ ही देर चलने के बाद आकाश अचानक घिर गया, और तेज़ बारिश शुरू हो गई। संत उस युवक के साथ वापस आश्रम की ओर भागे। रास्ते में वही पेड़ अड़ा था, जिसके नीचे अभी उन्होंने पंछी की रक्षा की थी। संत ने युवक का हाथ पकड़ा और बोले—
“इधर आओ!”

दोनों पेड़ के नीचे खड़े हो गए। आश्चर्य की बात यह कि वही पत्तियाँ जिनसे उन्होंने पंछी का घाव ढका था, अब हवा और बारिश रोककर एक प्राकृतिक छत सा बना रही थीं। दोनों भीगने से बच गए।

युवक आश्चर्य से बोला— “गुरुदेव, यह तो चमत्कार है!”

संत बोले— “बेटा, यह चमत्कार नहीं… यह प्रकृति का नियम है। जब हम शुभ कर्म करते हैं—चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो—प्रकृति उसे खोने नहीं देती। वह किसी न किसी रूप में, किसी न किसी समय, अद्भुत फल बनकर लौट आता है। हमने अभी एक छोटे-से प्राणी का दुःख दूर किया, और प्रकृति ने तुरंत हमारा दुःख दूर कर दिया।”

युवक की आँखें भीग गईं। वह बोला— “गुरुदेव, आज समझ आया कि शुभ कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते।”

संत ने आशीर्वाद देते हुए कहा—“बस यही जीवन का सार है। शुभ कर्म करो, बिना फल की चिंता किए। प्रकृति तुम्हारे लिए ऐसे दरवाज़े खोलेगी जिन्हें तुमने कभी सोचा भी नहीं होगा।”

उस दिन के बाद युवक का जीवन बदल गया। वह जहाँ भी जाता, किसी न किसी रूप में शुभ कर्म करता—और सचमुच उसके जीवन में अप्रत्याशित सुख, सम्मान और सफलता आने लगी।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब मन से शुभ कर्म करते हैं, तो प्रकृति अद्भुत रूप से हमारी रक्षा, प्रगति और उन्नति का मार्ग बनाती है।

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