धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—821

एक बार मेंढकों की एक टोली जंगल से गुजर रही थी। चलते-चलते अचानक दो मेंढक एक बहुत गहरे गड्ढे में गिर गए। जब दूसरे मेंढकों ने देखा कि गड्ढा कितना गहरा है, तो वे ऊपर इकट्ठा हो गए और चिल्लाने लगे, “अरे! यह तो बहुत गहरा है, तुम दोनों कभी बाहर नहीं निकल पाओगे। हार मान लो, यहाँ से निकलना नामुमकिन है!”

गड्ढे में गिरे दोनों मेंढकों ने शुरू में उन बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपनी पूरी ताकत लगाकर ऊपर उछलने की कोशिश करने लगे। वे जितनी बार उछलते, ऊपर खड़े मेंढक और ज़ोर से चिल्लाते, “बेकार है! इतनी मेहनत मत करो, तुम अपनी जान गँवा दोगे। देखो कितना ऊँचा है, तुम नहीं कर सकते!”

कुछ देर बाद, एक मेंढक ने ऊपर खड़े साथियों की बात मान ली। उसे लगा कि वे सही कह रहे हैं, यह वाकई नामुमकिन है। उसने कोशिश करना छोड़ दिया और निराश होकर गड्ढे के कोने में बैठ गया, जहाँ अंततः उसकी मृत्यु हो गई।

लेकिन दूसरा मेंढक रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह और भी ज़ोर-ज़ोर से उछल रहा था। ऊपर खड़े मेंढक अभी भी चिल्ला रहे थे, “पागल मत बनो! रुक जाओ! तुम कभी बाहर नहीं आ पाओगे।”

अचानक, एक ज़ोरदार छलांग के साथ वह मेंढक गड्ढे से बाहर निकल आया। ऊपर खड़े सभी मेंढक हैरान रह गए। उन्होंने उससे पूछा, “क्या तुमने हमारी आवाज़ नहीं सुनी? हम तो कह रहे थे कि यह नामुमकिन है।”

तब उस मेंढक ने इशारों में बताया कि वह ‘बहरा’ है। उसे लग रहा था कि ऊपर खड़े उसके साथी उसे चिल्ला-चिल्ला कर प्रोत्साहित कर रहे हैं और कह रहे हैं कि “तुम कर सकते हो! और ऊँचा कूदो!”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब लोग कहें कि “तुमसे नहीं होगा” या “यह बेकार का काम है”, तो उस समय उस बहरे मेंढक की तरह बन जाना ही समझदारी है। उनकी बातों को ‘हौसला’ समझ लें या बिल्कुल न सुनें। कामयाबी का रास्ता आपके अंदर से होकर गुजरता है, बाहर के शोर से नहीं। आपका काम आपकी प्रार्थना होनी चाहिए, और लोगों की बातें केवल पृष्ठभूमि का शोर।

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