धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—818

बहुत समय पहले की बात है, एक राजा था जो अपनी बुद्धि और वैभव पर बहुत गर्व करता था। उसने एक प्रसिद्ध संत के बारे में सुना कि वे कहते हैं— “जो बदल जाए वो सत्य नहीं, और जो सत्य है वो कभी बदलता नहीं।”

राजा को यह बात बड़ी अजीब लगी। उसने संत को चुनौती देने के लिए अपने दरबार में बुलाया।

जब संत दरबार में आए, तो राजा ने गर्व से अपने चारों ओर देखा और कहा, “महाराज, आप कहते हैं कि जो बदलता है वह सत्य नहीं है। देखिए, यह मेरा विशाल महल पत्थर और लोहे से बना है। यह सदियों से खड़ा है और आगे भी रहेगा। मेरी यह प्रजा, मेरा यह शरीर, क्या ये सब झूठ हैं?”

संत शांत रहे और बोले, “राजन, क्या आप मुझे अपने महल के सबसे सुरक्षित तहखाने में ले चलेंगे?”

राजा संत को एक ऐसे कमरे में ले गया जहाँ रत्ती भर भी रोशनी नहीं थी। संत ने कहा, “राजन, अब बताइए आपका वह विशाल महल कहाँ है? आपके वे हीरे-जवाहरात कहाँ हैं? क्या आपको अपना यह शरीर दिखाई दे रहा है?”

राजा ने झल्लाकर कहा, “महाराज, कैसी बातें करते हैं? अँधेरा है इसलिए कुछ दिख नहीं रहा, पर महल तो यहीं है!”

संत ने धीमे से कहा, “महल वहीँ है, पर आपका अनुभव बदल गया। रोशनी में वह ‘सत्य’ था, अँधेरे में वह ‘शून्य’ हो गया। जो प्रकाश पर निर्भर करे, वह परम सत्य कैसे हो सकता है?”

राजा अभी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं था। तब संत ने एक अद्भुत प्रयोग किया। उन्होंने राजा से पूछा: “राजन, जब आप 5 साल के बालक थे, तब क्या आप खुद को ‘मैं’ कहते थे?”

राजा: “हाँ, बिल्कुल।”

संत: “आज आप 50 साल के सम्राट हैं, क्या आज भी आप खुद को ‘मैं’ कहते हैं?”

राजा: “हाँ, कहता हूँ।”

संत: “सोचिए, 5 साल वाला शरीर अब नहीं रहा, वह बदल गया। 5 साल वाली नादान बुद्धि अब नहीं रही, वह बदल गई। 5 साल वाले खिलौने अब आपके पास नहीं हैं। सब कुछ बदल गया, लेकिन आपके अंदर का वह ‘मैं’ (होने का अहसास) नहीं बदला। वह तब भी वही था, आज भी वही है।”

संत ने आगे समझाया, “राजन, जैसे सिनेमा के पर्दे पर आग दिखाई दे तो पर्दा जलता नहीं, और पानी दिखाई दे तो पर्दा भीगता नहीं। फिल्में (दृश्य) बदलती रहती हैं, पर पर्दा (आधार) वही रहता है।

इसी तरह, यह संसार एक चलता-फिरता चित्रपट है। बचपन, जवानी, बुढ़ापा, सुख और दुख—ये सब आते-जाते दृश्य हैं। सत्य वह पर्दा है जिस पर ये सब घटित हो रहा है। वह अपरिवर्तनीय चैतन्य ही ईश्वर है, वही सत्य है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “सत्य” कोई सूचना नहीं है जिसे याद किया जाए, बल्कि वह एक अनुभव है। जब हम अपनी बदलती हुई परिस्थितियों से खुद को अलग करके उस ‘स्थिर’ तत्व को देखने लगते हैं, तब हम सत्य के करीब होते हैं।

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