एक बार एक बहुत ही प्रभावशाली और डिग्री-धारी विद्वान एक झोपड़ी में रहने वाले संत के पास पहुँचा। वह विद्वान अपनी शिक्षा और अपनी संपत्ति पर बहुत घमंड करता था। उसने संत से पूछा, “महाराज, मेरे पास संसार की सबसे बड़ी डिग्रियाँ हैं, अपार धन है, फिर भी मुझे वह मानसिक सुकून और ‘बादशाह’ जैसा अनुभव क्यों नहीं होता जो आपके चेहरे पर दिखता है?”
संत मुस्कुराए और बोले, “पुत्र, बादशाहत कागजों के टुकड़ों (डिग्री) में नहीं, इंसान के ख्यालों में होती है।”
इसे समझाने के लिए संत ने दो लोगों का उदाहरण दिया:
पहला व्यक्ति: जिसके पास महल था, लेकिन उसकी सोच छोटी थी। वह हर समय इस डर में जीता था कि कोई उसका धन न छीन ले। वह सुरक्षा घेरों में रहकर भी एक कैदी की तरह महसूस करता था।
दूसरा व्यक्ति: एक गरीब लकड़हारा था, जो दिन भर मेहनत करता और शाम को जो मिलता, उसमें से आधा दान कर देता। वह रात को खुले आसमान के नीचे चैन की नींद सोता और खुद को दुनिया का सबसे सुखी इंसान मानता था।
संत ने कहा, “डिग्री तुम्हें ‘नौकरी’ दिला सकती है, लेकिन ‘नजरिया’ तुम्हें साम्राज्य देता है। जो व्यक्ति अपनी सोच में सकारात्मक है, जो अभाव में भी संतुष्ट है और जिसका मन अपने वश में है, असल में वही बादशाह है। डिग्रियाँ केवल यह बताती हैं कि आपने क्या पढ़ा है, लेकिन आपकी सोच बताती है कि आप कौन हैं।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, डिग्रियाँ जानकारी देती हैं, लेकिन सोच आपको ‘अवसर’ देखना सिखाती है। कागज की डिग्री फटने पर साहस खत्म हो सकता है, लेकिन ऊँची सोच वाला इंसान शून्य से दोबारा साम्राज्य खड़ा कर सकता है। लोग आपकी डिग्री को नहीं, आपके व्यक्तित्व और आपकी सोच का अनुसरण करते हैं। “बादशाहत किसी सिंहासन की मोहताज नहीं होती, यह तो उस इंसान के भीतर होती है जिसने अपनी इच्छाओं को जीत लिया हो।”








