धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 848

एक बार की बात है, एक युवक अपने मन की उलझनों से बहुत परेशान था। उसके मन में हर समय अनगिनत विचार चलते रहते—कभी भविष्य की चिंता, कभी अतीत का पछतावा, तो कभी बेकार की कल्पनाएँ। परिणाम यह हुआ कि वह किसी भी काम में ध्यान नहीं लगा पाता था और जीवन में आगे बढ़ने में असफल हो रहा था।

एक दिन वह एक संत के पास पहुँचा और बोला, “गुरुदेव, मेरा मन हमेशा भटकता रहता है। मैं क्या करूँ?”

संत मुस्कुराए और उसे पास के बगीचे में ले गए। वहाँ उन्होंने युवक को एक टोकरी दी और कहा, “इसमें पानी भरकर लाओ।”

युवक ने कोशिश की, लेकिन टोकरी में पानी टिक ही नहीं रहा था। बार-बार प्रयास करने के बाद भी टोकरी खाली ही रही। वह थककर बोला, “गुरुदेव, यह असंभव है।”

संत ने शांत स्वर में कहा, “जैसे इस टोकरी में पानी नहीं ठहर सकता, वैसे ही अर्थहीन विचार तुम्हारे मन में आते तो हैं, पर टिकते नहीं। लेकिन तुम उन्हें पकड़कर बैठ जाते हो, और यही तुम्हारी परेशानी का कारण बनता है।”

युवक ने पूछा, “तो फिर मुझे क्या करना चाहिए?”

संत बोले, “अर्थहीन विचारों से बचो। उन्हें महत्व मत दो। अपना ध्यान सार्थक कार्यों में लगाओ—तभी मन शांत होगा और जीवन में सही दिशा मिलेगी।”

युवक ने संत की बात समझी और धीरे-धीरे अपने विचारों को नियंत्रित करना शुरू किया। उसने अपने समय और ऊर्जा को अच्छे कार्यों में लगाना शुरू किया, और कुछ ही समय में उसका जीवन बदल गया।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, अर्थहीन विचार मन को कमजोर करते हैं और हमें लक्ष्य से भटका देते हैं। यदि हम उन्हें महत्व देना छोड़ दें और अपना ध्यान सही दिशा में लगाएँ, तो सफलता और शांति दोनों प्राप्त हो सकती हैं।

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