धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 876

एक नगर में सेठ धनराज नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसके पास अपार धन-संपत्ति थी, लेकिन वह हमेशा तनाव और डर में रहता था। उसे डर था कि कहीं उसके व्यापार में घाटा न हो जाए, कहीं चोर उसके खजाने को न लूट लें, या कहीं राजा उस पर भारी कर न लगा दे।

उसी नगर के बाहर एक वृक्ष के नीचे एक संत रहते थे। उनके पास पहनने के लिए दो वस्त्रों के अलावा कुछ नहीं था, लेकिन वे हमेशा आनंद में डूबे रहते थे।

एक दिन सेठ धनराज भारी सुरक्षा के साथ संत के पास पहुँचा और पूछा, “महाराज, मेरे पास सब कुछ है—सैनिक हैं, धन है, महल है—फिर भी मैं रात भर सो नहीं पाता। हर आहट पर चौकन्ना हो जाता हूँ। आप इस खुले जंगल में हिंसक पशुओं के बीच बिना किसी सुरक्षा के इतनी गहरी नींद कैसे सो लेते हैं?”

संत मुस्कुराए और बोले, “सेठ जी, आप अपनी ‘चीजों’ पर निर्भर हैं। आप अपनी तलवार पर निर्भर हैं, इसलिए आपको डर है कि वह टूट सकती है। आप अपने धन पर निर्भर हैं, इसलिए डर है कि वह छिन सकता है। मैं अपनी आत्मा पर निर्भर हूँ, जिसे न कोई काट सकता है और न कोई चुरा सकता है।”

संत ने सेठ को समझाने के लिए एक उदाहरण दिया। उन्होंने सेठ को एक कीमती पारस पत्थर (जिससे लोहा सोना बन जाता है) दिया और कहा, “इसे सात दिनों के लिए अपने पास रखो, लेकिन शर्त यह है कि इसे खोना नहीं चाहिए।”

सेठ पत्थर लेकर घर गया। उन सात दिनों में सेठ की हालत और खराब हो गई।

वह सो नहीं सका क्योंकि उसे डर था कि सेवक उसे चुरा लेंगे।

उसने खाना छोड़ दिया क्योंकि उसे डर था कि कोई उसे जहर देकर पत्थर न ले जाए।

वह हर मित्र को शत्रु की दृष्टि से देखने लगा।

सातवें दिन सेठ वापस संत के पास पहुँचा। उसकी आँखें धँसी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ था। उसने वह पत्थर संत के चरणों में रख दिया और कहा, “महाराज, यह पत्थर नहीं, यह तो साक्षात भय है! जब तक यह मेरे पास था, मैं एक पल के लिए भी चैन से नहीं रह पाया।”

संत ने पत्थर उठाकर पास की नदी में फेंक दिया। सेठ चिल्लाया, “यह आपने क्या किया? इतना कीमती पत्थर!”

संत शांत भाव से बोले, “जब तक तुम उस पत्थर के मूल्य पर निर्भर थे, तुम डरे हुए थे। अब जब वह चला गया है, तो क्या तुम निडर महसूस नहीं कर रहे? देखो, तुम्हारे हाथ खाली हैं, लेकिन अब तुम्हें किसी चोर का डर नहीं है।” “निर्भयता का अर्थ ताकतवर होना नहीं है, बल्कि ‘जरूरतों’ से मुक्त होना है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जब आप यह जान लेते हैं कि दुनिया की कोई भी बाहरी चीज़ (पद, पैसा, व्यक्ति) स्थायी नहीं है, तो आप उन पर निर्भर होना छोड़ देते हैं। जैसे ही निर्भरता खत्म होती है, “अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ही सत्य हूँ) का भाव जाग्रत होता है और मनुष्य शेर की तरह निडर हो जाता है।

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Jeewan Aadhar Editor Desk