हिमालय की तलहटी में एक आश्रम था। वहाँ एक संत रहते थे जिनके पास दूर-दूर से लोग अपनी समस्याएँ लेकर आते थे। एक दिन मोहन नाम का युवक संत के पास पहुँचा। उसके चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें थीं।
उसने कहा, “गुरुदेव, मेरा मन हमेशा अशांत रहता है। कभी पुरानी गलतियों का पछतावा सताता है, तो कभी भविष्य की चिंता। न काम में मन लगता है और न जीवन में आनंद मिलता है।”
संत ने उसकी बात सुनी और अगले दिन सुबह उसे साथ चलने को कहा। भोर होते ही संत मोहन को जंगल की ओर ले गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उसे दो भारी बोरे दिए। पहले बोरे में पत्थर भरे थे। संत ने कहा, “इस बोरे का नाम है—अतीत। इसमें तुम्हारी सारी गलतियाँ, असफलताएँ, अपमान और पछतावे भरे हैं।” दूसरे बोरे में भी पत्थर थे। संत बोले, “इसका नाम है—भविष्य। इसमें तुम्हारी सारी चिंताएँ, डर, आशंकाएँ और कल्पनाएँ भरी हैं।”
फिर संत ने दोनों बोरे मोहन के कंधों पर रख दिए और कहा, “अब मेरे साथ चलो।” कुछ ही दूर चलने पर मोहन हाँफने लगा। उसके कंधे दर्द करने लगे और पैरों में कंपन होने लगी। वह बोला, “गुरुदेव, यह भार बहुत भारी है। मुझसे चला नहीं जा रहा।”
संत मुस्कुराए और बोले, “थोड़ा और चलो।” कुछ देर बाद मोहन थककर जमीन पर बैठ गया।
संत ने पूछा, “तुम्हें सबसे अधिक परेशानी किस बात से हो रही है?”
मोहन बोला, “इन दोनों बोरों के भार से।”
संत ने पहले बोरे की ओर इशारा करते हुए कहा, “इसमें जो पत्थर हैं, क्या तुम इन्हें बदल सकते हो?”
“नहीं गुरुदेव।”
“क्या तुम बीते हुए कल को वापस ला सकते हो?”
“नहीं।”
संत ने वह बोरा उसके कंधे से उतार दिया। मोहन को तुरंत कुछ हल्कापन महसूस हुआ। फिर संत ने दूसरे बोरे की ओर संकेत किया। “इसमें जो पत्थर हैं, क्या इनमें से कोई सचमुच अभी तुम्हारे सामने मौजूद है?”
मोहन ने सोचा और कहा, “नहीं। इनमें से अधिकांश तो केवल मेरी कल्पनाएँ हैं।”
संत ने दूसरा बोरा भी नीचे रख दिया। अब मोहन पूरी तरह हल्का महसूस कर रहा था। संत उसे पास बहती नदी के किनारे ले गए। नदी का जल शांत गति से बह रहा था।
संत ने पूछा, “नदी को देख रहे हो?”
“हाँ, गुरुदेव।”
“क्या नदी पीछे बह चुके पानी को पकड़कर रखती है?”
“नहीं।”
“क्या वह आगे आने वाले पानी की चिंता करती है?”
“नहीं।”
“फिर भी वह निरंतर बहती रहती है और अपना मार्ग बना लेती है।”
मोहन ध्यान से सुन रहा था।
संत ने कहा, “मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह बीते हुए कल को अपने कंधों पर लादे रहता है और आने वाले कल को लेकर डरता रहता है। परिणाम यह होता है कि उसके पास आज को जीने की शक्ति ही नहीं बचती।” “अतीत से सीख लो, लेकिन उसे ढोओ मत। भविष्य की योजना बनाओ, लेकिन उसकी चिंता में मत जलो। अपना ध्यान वर्तमान के कर्म पर रखो।”
मोहन की आँखें नम हो गईं। उसने पूछा, “गुरुदेव, क्या जीवन की सारी चिंताएँ ऐसे ही समाप्त हो जाएँगी?”
संत ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “चिंताएँ समाप्त नहीं होंगी, लेकिन उनका भार समाप्त हो जाएगा। क्योंकि तब तुम उन्हें अपने सिर पर नहीं, अपने विवेक में रखोगे।”
उस दिन के बाद मोहन ने एक नियम बना लिया। वह हर सुबह स्वयं से पूछता—”आज मुझे क्या करना है?” और हर रात स्वयं से पूछता—”आज मैंने क्या सीखा?” धीरे-धीरे उसका पछतावा कम होने लगा, भविष्य का भय भी घट गया और उसका मन पहले से अधिक शांत रहने लगा। वर्षों बाद जब लोग उससे उसकी सफलता का रहस्य पूछते, तो वह मुस्कुराकर कहता— “जिस दिन मैंने अतीत और भविष्य के दो बोरे उतार दिए, उसी दिन जीवन का असली आनंद मिल गया।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी,अतीत अनुभव देने के लिए है, बोझ बनने के लिए नहीं। भविष्य दिशा देने के लिए है, डर पैदा करने के लिए नहीं। जो व्यक्ति वर्तमान में अपना श्रेष्ठ कर्म करता है, वही सच्ची शांति और सफलता प्राप्त करता है।








