महाभारत का किस्सा है। कर्ण जन्म से ही असाधारण प्रतिभा का धनी था, वह अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा लेना चाहता था। इसके लिए वह परशुराम जी के पास पहुंचा। परशुराम जी केवल ब्राह्मणों को ही शस्त्र विद्या देते थे। कर्ण यह जानता था कि यदि वह अपनी सच्चाई बताएगा तो उसे शिक्षा नहीं मिलेगी। इसी कारण उसने स्वयं को ब्राह्मण बताया। परशुराम जी ने उसकी विनम्रता और लगन देखकर उसे शिष्य बना लिया और उसे दिव्यास्त्रों का ज्ञान देना शुरू किया।
एक दिन जंगल यात्रा के दौरान परशुराम जी कर्ण की गोद में सिर रखकर विश्राम कर रहे थे। उसी समय एक कीड़ा कर्ण की जांघ पर लगातार डंक मारने लगा। असहनीय पीड़ा के बावजूद कर्ण हिला नहीं, क्योंकि उसे डर था कि गुरु की नींद टूट जाएगी और सेवा-धर्म भंग हो जाएगा। खून बहता रहा, पर कर्ण अडिग रहा।
जब परशुराम जी की नींद टूटी तो उन्होंने यह दृश्य देखा और समझ गए कि कोई ब्राह्मण इतनी सहनशीलता नहीं दिखा सकता। उन्होंने कर्ण से सच्चाई पूछी। कर्ण ने स्वीकार कर लिया कि वह झूठ बोलकर शिक्षा प्राप्त कर रहा है। परशुराम जी क्रोधित हुए, लेकिन साथ ही दुखी भी हुए। उन्होंने उसे शाप दिया कि जब उसे अपने दिव्यास्त्रों की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, तब वह उनकी विधि भूल जाएगा।
महाभारत युद्ध में वही हुआ। अर्जुन के सामने निर्णायक क्षण में कर्ण अपनी शक्तिशाली अस्त्र-विद्या का उपयोग नहीं कर सका। उसकी क्षमता होने के बावजूद वह अपने ही कर्मों और झूठ के परिणाम से बंध गया और बाद में अर्जुन ने कर्ण का वध कर दिया।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए झूठ का सहारा अस्थायी सफलता दे सकता है, लेकिन लंबे समय में यह नुकसान पहुंचाता है। कर्ण की तरह प्रतिभा होने के बावजूद यदि आधार गलत हो, तो परिणाम अच्छे नहीं मिलते हैं। इसलिए व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन में सत्य को प्राथमिकता दें।








