एक छोटे से गाँव में आदित्य नाम का एक युवक रहता था। वह स्वभाव से बहुत सरल और दूसरों की बातों में जल्दी आ जाने वाला था। गाँव के लोग अक्सर अपनी-अपनी राय उस पर थोप देते, और आदित्य बिना सोचे-समझे वही करने लगता।
धीरे-धीरे यह आदत उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। कभी कोई कहता — “यह काम सही है”, तो वह उसी रास्ते पर चल पड़ता। फिर दूसरा व्यक्ति आकर कहता — “नहीं, यह गलत है”, तो वह तुरंत अपना निर्णय बदल देता।
एक दिन गाँव में एक संत आए। आदित्य उनके पास पहुँचा और बोला: “गुरुदेव, मैं हमेशा उलझन में रहता हूँ। हर कोई कुछ अलग कहता है, और मैं समझ नहीं पाता कि सही क्या है और गलत क्या।”
संत मुस्कुराए और उसे पास के एक तालाब पर ले गए।
उन्होंने आदित्य से कहा, “इस पानी में अपना चेहरा देखो।”
आदित्य ने देखा—पानी बिल्कुल साफ था, उसका चेहरा स्पष्ट दिख रहा था।
फिर संत ने पानी में एक पत्थर फेंका। पानी में हलचल हो गई और चेहरा धुंधला पड़ गया।
संत ने कहा:“जब तक तुम्हारा मन शांत है, तब तक तुम सही और गलत को साफ देख सकते हो। लेकिन जब तुम दूसरों की बातों और परिस्थितियों से प्रभावित हो जाते हो, तो मन विचलित हो जाता है — और तुम्हारा विवेक धुंधला पड़ जाता है।”
आदित्य को अपनी गलती समझ आ गई। उसे एहसास हुआ कि समस्या दूसरों में नहीं, बल्कि उसके अपने निर्णय लेने की कमजोरी में थी।
उस दिन के बाद उसने ठान लिया कि: वह दूसरों की बातें सुनेगा, लेकिन निर्णय अपने विवेक से करेगा।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति का खुद पर इतना प्रभाव न होने दें कि आप सही और गलत का फर्क ही न समझ पाएं।” जब मन शांत और संतुलित होता है, तभी जीवन में सही दिशा मिलती है। दूसरों की राय महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम निर्णय हमेशा अपने विवेक से ही लेना चाहिए।








