एक समय की बात है, एक प्रसिद्ध संत अपने आश्रम में शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे। उन्होंने देखा कि कुछ शिष्यों में ‘अहंकार’ आ गया है। वे सोचने लगे थे कि वे अकेले ही सिद्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं और उन्हें किसी के साथ की आवश्यकता नहीं है।
शिष्यों को सही राह दिखाने के लिए संत ने उन्हें एक नदी के किनारे बुलाया।
संत ने एक भारी पत्थर की ओर इशारा करते हुए अपने सबसे बलवान शिष्य से कहा, “पुत्र, इस पत्थर को उठाकर नदी के उस पार ले जाओ।”
शिष्य ने पूरी ताकत लगा दी। वह पसीने से तर-बतर हो गया, लेकिन पत्थर टस से मस न हुआ। उसने हार मान ली और कहा, “गुरुदेव, यह असंभव है। अकेला मनुष्य इसे नहीं उठा सकता।”
संत मुस्कुराए और उन्होंने सभी शिष्यों को बुलाया। उन्होंने कहा, “अब तुम सब मिलकर इस पत्थर को उठाओ।”
जब दस-बारह शिष्यों ने एक साथ हाथ लगाया, तो वह पत्थर खिलौने की तरह उठ गया और उन्होंने आसानी से उसे नदी के पार पहुँचा दिया।
पत्थर रखने के बाद संत ने शिष्यों को पास बिठाया और जीवन का सबसे बड़ा मंत्र दिया: “जब तुम अकेले थे, तो तुम्हारी शक्ति सीमित थी। पत्थर का भार तुम्हारी क्षमता से अधिक था।”
“जब तुम सब मिले, तो तुम्हारी व्यक्तिगत शक्तियाँ आपस में जुड़ गईं। जो काम एक के लिए ‘असंभव’ था, वह समूह के लिए ‘सहज’ बन गया।”
“बड़े लक्ष्यों के मार्ग में ‘मैं’ (अहंकार) सबसे बड़ी बाधा है। जब ‘मैं’ की जगह ‘हम’ आ जाता है, तो बड़े से बड़ा लक्ष्य छोटा पड़ जाता है।”
“अकेले हम सिर्फ एक बूंद हैं, साथ मिलकर हम एक महासागर हैं।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जिस प्रकार एक-एक धागे को जोड़कर एक मजबूत रस्सी बनाई जाती है, जिससे हाथी को भी बांधा जा सकता है, ठीक वैसे ही सामूहिक प्रयास से हम दुनिया का हर बड़ा लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।








