एक बार हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे से गांव में एक संत रहते थे। दूर-दूर से लोग उनके पास अपने मन की उलझनें लेकर आते थे। संत बहुत शांत स्वभाव के थे। वे कम बोलते, लेकिन उनकी हर बात सीधे दिल में उतर जाती थी।
उसी गांव में अर्जुन नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत ईमानदार, सरल और साफ दिल का था। किसी की झूठी तारीफ करना, दिखावा करना या लोगों को खुश करने के लिए नकली व्यवहार करना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था। वह जैसा सोचता, वैसा ही बोलता था।
लेकिन धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि लोग उससे दूरी बनाने लगे हैं। गांव में कुछ ऐसे लोग थे जो सामने मीठी बातें करते, हर किसी की झूठी प्रशंसा करते, बड़े विनम्र बनते, लेकिन पीछे से वही लोग दूसरों की बुराई भी करते थे। आश्चर्य की बात यह थी कि गांव में उन्हीं लोगों की सबसे ज्यादा पूछ थी।
जहाँ भी कोई आयोजन होता, वही लोग सबसे आगे दिखाई देते। लोग उनकी बातों पर हँसते, उन्हें सम्मान देते और उनके साथ रहना पसंद करते।
अर्जुन यह सब देखकर भीतर ही भीतर टूटने लगा। एक दिन बहुत दुखी होकर वह संत के पास पहुँचा।
उसने कहा— “गुरुदेव, मैं समझ नहीं पा रहा कि इस दुनिया में सच्चे लोगों की कद्र कम और बनावटी लोगों की ज्यादा क्यों होती है? जो लोग दिखावा करते हैं, मीठे झूठ बोलते हैं, वही सबको अच्छे लगते हैं। और जो व्यक्ति दिल से साफ हो, उसे लोग कठोर या घमंडी समझ लेते हैं।”
संत मुस्कुराए, लेकिन तुरंत कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने अर्जुन से कहा— “कल सुबह मेरे साथ बाजार चलना।”
अगली सुबह दोनों गांव के बड़े बाजार में पहुँचे। बाजार में चारों तरफ भीड़ थी। फल, मिठाइयाँ, कपड़े और तरह-तरह की चीजें बिक रही थीं।
संत अर्जुन को एक फल वाले के पास ले गए। वहाँ दो तरह के सेब रखे थे। पहले सेब चमकदार थे—इतने चमकदार कि उन्हें देखकर ही खरीदने का मन करे। दूसरे सेब थोड़े फीके और साधारण दिख रहे थे।
संत ने पूछा— “लोग कौन से सेब ज्यादा खरीद रहे हैं?”
अर्जुन बोला— “गुरुदेव, जाहिर है, चमकदार वाले।”
संत ने दुकानदार से एक-एक सेब कटवाया। जब चमकदार सेब काटा गया तो वह अंदर से सड़ा हुआ निकला। और साधारण दिखने वाला सेब अंदर से मीठा और ताजा था।
संत ने शांत स्वर में कहा— “मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है—वह आँखों से जल्दी प्रभावित हो जाता है। उसे सच्चाई से पहले आकर्षण दिखाई देता है। जो व्यक्ति शब्दों से जादू पैदा कर दे, झूठी मिठास दिखा दे, लोग उसकी तरफ खिंच जाते हैं।”
अर्जुन ध्यान से सुन रहा था।
संत आगे बोले— “लेकिन बेटा, दुनिया का आकर्षण और दुनिया का विश्वास—दोनों अलग बातें हैं।
बनावटी लोग आकर्षण जल्दी पैदा कर लेते हैं, लेकिन विश्वास नहीं बना पाते। और सच्चे लोग शुरुआत में कठोर लग सकते हैं, लेकिन समय के साथ वही सबसे भरोसेमंद साबित होते हैं।”
फिर संत अर्जुन को लेकर पास ही एक तालाब के किनारे पहुँचे।
तालाब में ऊपर-ऊपर गंदगी तैर रही थी। पानी साफ नहीं दिख रहा था। थोड़ी दूर एक कुआँ था। बाहर से साधारण, बिना किसी सजावट के। लेकिन उसका पानी बहुत मीठा और शुद्ध था।
संत बोले— “तालाब दूर से बड़ा और आकर्षक लगता है,लेकिन प्यास बुझाने के लिए लोग आखिर कुएँ के पास ही आते हैं।
ठीक वैसे ही,दिखावटी लोग भीड़ जुटा सकते हैं,लेकिन जीवन के कठिन समय में लोग सच्चे इंसान को ही खोजते हैं।”
अर्जुन की आँखें नम हो गईं।
उसने पूछा— “लेकिन गुरुदेव, तब तक तो सच्चा इंसान अकेला पड़ जाता है।”
संत हल्का सा मुस्कुराए और बोले— “सच्चाई का रास्ता हमेशा थोड़ा अकेला होता है। क्योंकि वहाँ अभिनय नहीं होता। वहाँ मनुष्य को अपने असली रूप में जीना पड़ता है।
लोग अक्सर उन लोगों के पास जाते हैं जो उन्हें वही सुनाएँ जो वे सुनना चाहते हैं। लेकिन जो व्यक्ति सच बोलता है, वह कभी-कभी मन के भ्रम तोड़ देता है। और इंसान अपने भ्रम टूटते देखना पसंद नहीं करता।”
कुछ देर मौन रहने के बाद संत ने अंतिम बात कही— “याद रखना अर्जुन—बनावटी इंसान फूलों की तरह होते हैं, जो कुछ समय के लिए बहुत सुंदर लगते हैं।
लेकिन सच्चे इंसान वृक्ष की तरह होते हैं—धीरे-धीरे पहचान में आते हैं,पर एक बार जीवन में जगह बना लें, तो पूरी उम्र छाया देते हैं।”
उस दिन अर्जुन के मन का बोझ हल्का हो गया। उसे समझ आ गया कि दुनिया की तुरंत मिलने वाली प्रशंसा ही असली सफलता नहीं होती।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, समय के साथ नकली चेहरे उतर जाते हैं, लेकिन सच्चे चरित्र की चमक उम्र भर बनी रहती है। दुनिया अक्सर दिखावे से जल्दी प्रभावित हो जाती है, लेकिन अंत में सम्मान उसी व्यक्ति को मिलता है जिसका मन सच्चा, व्यवहार साफ और चरित्र मजबूत हो।








