एक संत नदी किनारे बैठे थे। तभी एक युवक उनके पास आया। उसकी आंखों में उदासी थी और मन भारी था। उसने संत से कहा, “गुरुदेव, जीवन में इतना दुख है कि अब कुछ अच्छा नहीं लगता। कितनी भी कोशिश कर लूं, मन का दर्द खत्म ही नहीं होता।”
संत मुस्कुराए और उसे अपने साथ पास के बगीचे में ले गए। वहां एक पेड़ के नीचे सूखे पत्तों का ढेर पड़ा था। संत ने पूछा, “क्या तुम जानते हो, ये पत्ते पेड़ से क्यों गिर गए?”
युवक बोला, “क्योंकि उनका समय पूरा हो गया।”
संत ने कहा, “बिल्कुल… और पेड़ ने उन्हें पकड़कर रोकने की कोशिश भी नहीं की। क्योंकि प्रकृति जानती है कि कुछ चीजें समय आने पर अपने-आप समाप्त हो जाती हैं।”
फिर संत ने युवक से कहा, “जीवन के कुछ दुख भी ऐसे ही होते हैं। हम उन्हें बार-बार याद करके, पकड़कर, अपने मन से बांधकर रखते हैं। जबकि समय धीरे-धीरे उन्हें कमजोर कर रहा होता है।” “हर घाव का इलाज तुरंत नहीं होता। कुछ घावों पर समय मरहम बनकर उतरता है। अगर इंसान धैर्य रखे, खुद को टूटने न दे और आगे बढ़ता रहे… तो एक दिन वही दुख सिर्फ एक पुरानी याद बन जाता है।”
युवक शांत होकर संत की बातें सुनता रहा। संत ने अंत में कहा— “हर समस्या लड़कर ही खत्म नहीं होती, कुछ दुख समय के साथ अपने-आप समाप्त हो जाते हैं। बस धैर्य रखना पड़ता है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, समय जीवन का सबसे बड़ा चिकित्सक है। हर पीड़ा हमेशा नहीं रहती, इसलिए कठिन समय में धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए।








