धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—900

एक बार एक युवक समुद्र किनारे बैठा था। उसके मन में बहुत बेचैनी थी। कभी व्यापार की चिंता, कभी लोगों की बातें, कभी अपमान का डर… उसे लगता था कि जीवन में थोड़ी-सी परेशानी आते ही उसका मन टूट जाता है।

तभी वहाँ एक संत आए। उन्होंने युवक को उदास देखा और पास बैठ गए।

संत ने पूछा,“इतना परेशान क्यों हो पुत्र?”

युवक बोला,“महाराज, मैं बहुत जल्दी टूट जाता हूँ। लोग कुछ कह दें तो मन दुखी हो जाता है।
थोड़ी असफलता मिले तो हिम्मत हार जाता हूँ। समझ नहीं आता कि मजबूत कैसे बनूँ?”

संत मुस्कुराए। उन्होंने समुद्र की ओर इशारा किया और बोले, “जरा इन लहरों को देखो।”

युवक देखने लगा। लहरें उठतीं, शोर मचातीं और कुछ ही क्षणों में किनारे पर टूट जातीं।

संत बोले, “लहरों को लगता है कि वही समुद्र हैं। वे ऊँची उठती हैं, शोर करती हैं, अपना अस्तित्व दिखाती हैं… लेकिन किनारे तक आते-आते मिट जाती हैं।”

फिर संत ने युवक से पूछा, “क्या तुमने कभी समुद्र को टूटते देखा है?”

युवक ने कहा, “नहीं महाराज, समुद्र तो हमेशा विशाल और शांत दिखाई देता है।”

संत बोले, “यही जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है। जो लोग केवल लहर बनते हैं, वे छोटी-छोटी बातों में टूट जाते हैं। थोड़ी तारीफ मिले तो अहंकार में ऊपर उठ जाते हैं, और थोड़ी आलोचना मिले तो किनारे पर बिखर जाते हैं।”

“लेकिन जो समुद्र बन जाते हैं, वे भीतर से इतने गहरे होते हैं कि बाहरी तूफान उन्हें हिला नहीं पाते। लहरें समुद्र के ऊपर उठती हैं, पर समुद्र की गहराई हमेशा शांत रहती है।”

युवक ध्यान से सुन रहा था।

संत आगे बोले— “अगर जीवन में बड़ा बनना है, तो हर बात पर प्रतिक्रिया देना छोड़ो।
हर आवाज़ का जवाब देना छोड़ो। अपने भीतर इतनी गहराई पैदा करो कि लोगों की छोटी सोच,
छोटी बातें और छोटे व्यवहार तुम्हें छोटा न बना सकें।”

“याद रखो— लहरें हमेशा शोर करती हैं, लेकिन समुद्र अपनी गहराई से पहचाना जाता है।”

युवक की आँखों में चमक आ गई। उसने संत के चरण छुए और कहा, “महाराज, आज समझ आया कि मुझे लहर नहीं, समुद्र बनना है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जो इंसान हर छोटी बात पर टूट जाता है, वह लहर की तरह बिखर जाता है। लेकिन जो धैर्य, गहराई और शांत स्वभाव रखता है, वही समुद्र की तरह विशाल बनता है।

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