कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत युद्ध शुरू होने वाला था। दोनों ओर पांडव-कौरव की विशाल सेनाएं खड़ी थीं। कौरवों के पास संख्या बल अधिक था, जबकि पांडवों की सेना अपेक्षाकृत छोटी थी, लेकिन पांडवों के पास सबसे बड़ा बल था- धर्म और सत्य का साथ।
पांडवों में सबसे प्रमुख योद्धा अर्जुन थे। उनके रथ पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण सारथी बने हुए थे। युद्ध शुरू होने से ठीक पहले अर्जुन ने श्रीकृष्ण से आग्रह किया कि वे रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलें, ताकि मैं देख सकूं कि मुझे किन लोगों से युद्ध करना है। श्रीकृष्ण ने बिना कुछ बोले रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाकर खड़ा कर दिया।
अर्जुन ने सामने देखा- पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, और अपने ही परिवार के अनेक सदस्य युद्ध के लिए तैयार खड़े थे। यह दृश्य देखकर अर्जुन विचलित हो गए। उनका मन भारी हो गया। उनके हाथ से गांडीव धनुष गिर गया और वे रथ में बैठ गए।
अर्जुन ने कहा, “मैं यह युद्ध नहीं कर सकता। मेरे सामने मेरे अपने ही लोग हैं, जिनका मैं जीवन भर सम्मान करता आया हूं। मैं इन्हें कैसे मार सकता हूं?” अर्जुन का शरीर कांपने लगा, मुंह सूख गया और मन भ्रम से भर गया।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को देखा और समझ गए कि समस्या भय की नहीं, भ्रम की है। अर्जुन को बाहरी शत्रु से नहीं, अपने अंदर के द्वंद्व से लड़ना था। श्रीकृष्ण ने कहा, “हे अर्जुन, यह युद्ध केवल संबंधों का नहीं, धर्म और अधर्म का है। तुम अपने कर्तव्य से भाग रहे हो, क्योंकि तुम्हारा मन भ्रमित है। जब कर्तव्य स्पष्ट हो जाता है, तब निर्णय सरल हो जाता है।”
भगवान ने आगे कहा कि जीवन में कमजोरियां आना स्वाभाविक है, लेकिन भ्रम में रहना सबसे बड़ी कमजोरी है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से कर्म, धर्म और आत्मा का ज्ञान दिया।
धीरे-धीरे अर्जुन का मन शांत हुआ। उनका भ्रम दूर हुआ और उन्होंने पुनः गांडीव उठा लिया। उन्होंने कहा, “अब मेरा संशय समाप्त हो गया है। मैं अपने कर्तव्य के लिए तैयार हूं।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जीवन में जब हमें यह स्पष्ट नहीं होता कि हमें क्या करना है, तब निर्णय लेना कठिन हो जाता है। इसलिए किसी भी लक्ष्य या समस्या में पहले स्पष्टता लाएं, तभी सफलता मिल सकती है।








