धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से— 873

एक समय की बात है, एक प्रसिद्ध संत के पास दो व्यक्ति आए। एक बहुत ही भोला-भाला किसान था और दूसरा एक चतुर व्यापारी, जो समाज में अपनी भक्ति का ढोंग रचता था ताकि लोग उस पर भरोसा करें।

व्यापारी ने सोचा कि अगर वह संत से दीक्षा ले लेगा, तो उसका व्यापार और बढ़ेगा। उसने कीमती वस्त्र पहने, माथे पर बड़ा सा तिलक लगाया और हाथ में माला लेकर जोर-जोर से राम-नाम जपने लगा। वहीं किसान चुपचाप कोने में बैठकर संत के वचनों को सुनता और उसकी आँखों से प्रेम के आँसू बहते।

संत ने दोनों की नीयत भांप ली। उन्होंने दोनों को एक-एक पत्थर दिया और कहा:

“जाओ, इस पत्थर को साक्षात् भगवान मानकर इसकी सेवा करो। जो सबसे पहले पत्थर से बात कर लेगा, वही सच्चा भक्त कहलाएगा।”

व्यापारी की चालाकी: व्यापारी घर गया, उसने पत्थर को सोने के सिंहासन पर रखा। वह छप्पन भोग लगाता, लेकिन उसका मन इस बात में रहता कि ‘लोग देख रहे हैं या नहीं?’ वह मन ही मन सोचता कि “यह तो पत्थर है, यह क्या बोलेगा? बस दिखावा कर लेता हूँ ताकि संत जी मुझे सिद्ध घोषित कर दें।”

किसान की सरलता: किसान ने पत्थर को तुलसी के पौधे के पास रखा। वह उसे ही अपना सब कुछ मान बैठा। वह पत्थर से बातें करता, उसे अपने सुख-दुख सुनाता। वह भाव में इतना डूब गया कि उसे भूल ही गया कि यह पत्थर है।

कुछ दिन बाद व्यापारी संत के पास आया और झूठ बोलते हुए बोला, “महाराज! पत्थर ने मुझसे बात की और मुझे दर्शन दिए।”

संत मुस्कुराए और बोले, “अच्छा? तो बताओ भगवान ने क्या कहा?” व्यापारी सकपका गया और मनगढ़ंत बातें बनाने लगा। संत ने तुरंत पहचान लिया कि यह कपट है।

तभी किसान दौड़ता हुआ आया, उसके बाल बिखरे थे और वह रो रहा था। उसने संत के पैर पकड़ लिए और कहा, “महाराज! मेरा ठाकुर जी (पत्थर) आज खाना नहीं खा रहा। जब तक वह नहीं खाएगा, मैं भी नहीं खाऊँगा। कृपया चलिए और उसे समझाइए।”

संत समझ गए कि किसान की निष्कपट भक्ति ने जड़ पत्थर में भी प्राण फूंक दिए हैं। संत ने व्यापारी की ओर मुड़कर कहा:”भक्ति में चतुराई नहीं, चित्त की शुद्धि चाहिए। तुम भगवान को ठगने की कोशिश कर रहे थे, जबकि यह स्वयं को भगवान को सौंप चुका था।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, कपट और चालाकी संसार में तो काम आ सकती है, लेकिन ईश्वर के दरबार में केवल भाव देखा जाता है।

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Jeewan Aadhar Editor Desk

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