संत कबीर के आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे। वहाँ एक युवक भी शिक्षा लेने आया। वह अत्यंत बुद्धिमान था। शास्त्रों का बड़ा ज्ञाता था, लेकिन उसे अपने ज्ञान पर बहुत अभिमान था। जब भी आश्रम में कोई चर्चा होती, वह दूसरों को तुच्छ समझता और अपनी विद्वता का प्रदर्शन करता। धीरे-धीरे आश्रम के लोग उससे दूरी बनाने लगे। कोई उसके पास बैठना पसंद नहीं करता था।
एक दिन वह युवक संत कबीर के पास पहुँचा और बोला— “गुरुदेव! मेरे पास इतना ज्ञान है, फिर भी लोग मेरा सम्मान नहीं करते। ऐसा क्यों?”
कबीर मुस्कुराए। उन्होंने युवक को अगले दिन नदी किनारे आने को कहा। अगली सुबह दोनों नदी के पास पहुँचे। वहाँ एक बड़ा फलदार वृक्ष झुका हुआ खड़ा था और पास ही एक सूखा, सीधा खड़ा पेड़ था।
संत कबीर ने पूछा— “बताओ, इन दोनों में कौन-सा वृक्ष अधिक उपयोगी है?”
युवक बोला— “गुरुदेव! यह फलदार वृक्ष उपयोगी है। इसमें फल हैं, छाया है, इसलिए लोग इसके पास आते हैं।”
कबीर ने फिर पूछा— “और यह झुका हुआ क्यों है?”
युवक ने उत्तर दिया— “फल अधिक होने के कारण इसकी डालियाँ झुक गई हैं।”
तब संत कबीर बोले— “यही सच्ची विद्या का लक्षण है। जिस प्रकार फल से लदा वृक्ष झुक जाता है, उसी प्रकार सच्चा ज्ञानी विनम्र हो जाता है। लेकिन जो भीतर से खाली होता है, वह सूखे वृक्ष की तरह केवल अकड़कर खड़ा रहता है।”
युवक की आँखें खुल गईं। उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने उसी दिन से अभिमान छोड़ दिया और सबके साथ प्रेम व नम्रता से व्यवहार करने लगा। कुछ समय बाद वही लोग, जो उससे दूर रहते थे, उसके मित्र बन गए। अब सभी उसके ज्ञान से अधिक उसके व्यवहार की प्रशंसा करते थे।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, सच्ची विद्या कभी अहंकार नहीं देती। वह मनुष्य को विनम्र, सहनशील और प्रेमपूर्ण बनाती है। विनम्र व्यक्ति को समाज में आदर, स्नेह और सम्मान स्वतः प्राप्त होता है।








