धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—906

रामायण का प्रसंग है। अयोध्या नगरी भव्य रूप से सजी हुई थी। चारों ओर उत्सव का माहौल था। दीपों की रोशनी, फूलों की मालाएं और शहनाइयों की गूंज वातावरण को और भी पवित्र बना रही थी। सभी नागरिक अत्यंत प्रसन्न थे, क्योंकि अगले दिन श्रीराम का राज्याभिषेक होने वाला था।

इधर देवलोक में देवताओं के मन में एक चिंता थी। वे जानते थे कि यदि श्रीराम राजा बन गए, तो राम अवतार का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाएगा, भविष्य में रावण का वध होना तय है, इसके बाद धर्म की स्थापना होगी। इस स्थिति में कुछ देवताओं ने देवी सरस्वती से प्रार्थना की कि इस योजना में कोई ऐसी बाधा उत्पन्न की जाए, जिससे घटनाओं का क्रम बदल जाए।

देवी सरस्वती पहले इस विचार से अप्रसन्न हुईं, लेकिन नियति के तर्क को समझते हुए उन्होंने अयोध्या जाने का निर्णय लिया। अयोध्या पहुंचकर, देवी ने विचार किया कि किस व्यक्ति के माध्यम से स्थिति को प्रभावित किया जा सकता है। वे समझती थीं कि सीधे किसी सत्यनिष्ठ या मूल निवासी के मन को बदलना कठिन होगा, इसलिए उन्होंने ऐसे व्यक्ति की तलाश की जो भावनात्मक रूप से अधिक प्रभावित हो सके।

देवी सरस्वती की दृष्टि मंथरा पर पड़ी, जो रानी कैकयी के साथ उनके मायके से दहेज के रूप में आई दासी थी। मंथरा के स्वभाव में ही शंका और असुरक्षा की भावना थी। सरस्वती जी ने उसके विचारों में भ्रम उत्पन्न किया और उसकी सोच को प्रभावित कर दिया।

मंथरा की बुद्धि देवी सरस्वति ने भ्रमित कर दी थी, इसके बाद मंथरा ने कैकयी के मन में यह भावना भर दी कि राम के राज्याभिषेक से भरत का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा और उसे उसका उचित अधिकार नहीं मिलेगा। धीरे-धीरे कैकयी के मन में संशय और क्रोध उत्पन्न होने लगा। इसके बाद कैकयी ने राजा दशरथ से दो वरदान मांग लिए- भरत के लिए राज और राम के लिए वनवास।

इस प्रकार जिस राज्याभिषेक की तैयारी पूरे अयोध्या में उत्सव की तरह हो रही थी, वह उत्सव अचानक टल गया और राम को 14 वर्षों के लिए वनवास पर जाना पड़ गया। यह घटना आगे चलकर रामायण की महान कथा का आधार बनी, जिसमें धर्म, कर्तव्य और धैर्य की अद्भुत सीख छिपी है।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी,हमारे जीवन में भी कई बार लोग या परिस्थितियां हमारे सोचने के तरीके को प्रभावित करती हैं। जरूरी है कि हम समझें कि कौन-सी बात वास्तविक है और कौन-सी केवल भ्रम या डर पर आधारित है। जीवन में बड़े निर्णय लेते समय गुस्सा, डर या जल्दबाजी से बचना चाहिए। शांत मन से लिया गया निर्णय अधिक स्थिर और सही होता है।

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