गांव के किनारे एक छोटा-सा घर था। उस घर में रामसेवक अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता था। कभी उसके घर में खूब खुशियां थीं। बच्चे उसके आते ही दौड़कर गले लगते थे। पत्नी गर्व से कहती— “मेरे बच्चों के पिता बहुत मेहनती इंसान हैं।”
लेकिन समय बदला। रामसेवक धीरे-धीरे गलत संगत में पड़ गया। शराब और गुस्से ने उसके स्वभाव को बदल दिया। घर की जरूरतों से ज्यादा उसे अपनी आदतें प्यारी लगने लगीं।
बेटा स्कूल की फीस के लिए इंतजार करता रहता, बेटी नई किताबों के लिए तरसती रहती। पत्नी चुपचाप अपने गहने बेचकर घर चलाती रही।
एक रात बेटा देर तक पढ़ रहा था। रामसेवक नशे में घर लौटा और बिना बात चिल्लाने लगा। बेटे ने पहली बार ऊंची आवाज में कहा— “पिताजी, बस कीजिए… हमें आपसे डर लगता है।”
ये शब्द सुनकर रामसेवक कुछ पल के लिए शांत हो गया। जिस बेटे को उसने उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज वही उससे डर रहा था। दिन बीतते गए। अब बच्चे उससे बातें कम करने लगे। वह घर में होता, फिर भी जैसे कोई अपना मौजूद न हो।
एक दिन बारिश हो रही थी। रामसेवक बरामदे में अकेला बैठा था। उसने देखा— उसका बेटा अपनी मां से कह रहा था, “मां, मुझे जिंदगी में कुछ भी बनना पड़े… लेकिन पिताजी जैसा कभी नहीं बनना।”
ये सुनकर उसके हाथ से चाय का कप गिर पड़ा। उस रात वह बहुत रोया। शायद वर्षों बाद पहली बार उसे अपनी हार दिखाई दी थी। उसे समझ आया कि गरीबी हार नहीं थी… लोगों की बातें हार नहीं थीं…असल हार तो उस दिन हुई थी, जब उसके बच्चों की आंखों से उसके लिए सम्मान खत्म हो गया।
अगली सुबह उसने शराब की बोतल उठाई और पूरे गांव के सामने नाली में फेंक दी। लोग हंस रहे थे, ताने मार रहे थे, लेकिन इस बार उसे फर्क नहीं पड़ा। उसने मेहनत शुरू की। धीरे-धीरे घर बदलने लगा। महीनों बाद पहली बार उसकी बेटी उसके पास आकर बैठी और बोली— “पापा, चाय बनाऊं?”
बस… उस छोटे-से सवाल में उसे फिर से अपना खोया हुआ सम्मान दिखाई दे गया।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जिंदगी में सबसे बड़ी जीत पैसा कमाना नहीं, बल्कि अपने बच्चों के दिल में फिर से आदर पैदा करना होता है।








