धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—926

एक गाँव में एक वृद्ध संत रहते थे। दूर-दूर से लोग अपनी परेशानियाँ लेकर उनके पास आते थे। एक दिन एक युवक उदास मन से संत के चरणों में बैठ गया। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने कहा,”गुरुदेव, जब तक मेरे पास धन था, लोग मेरे साथ थे। जब काम अच्छा चल रहा था, मित्र भी बहुत थे। आज मुश्किल समय आया तो सब छोड़कर चले गए। हिम्मत भी टूट गई है और मैं बिल्कुल अकेला पड़ गया हूँ। अब क्या करूँ?”

संत मुस्कुराए और उसे अपने साथ जंगल की ओर ले गए। वहाँ एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। संत ने पूछा, “बताओ, इस पेड़ के नीचे इतनी ठंडी छाया क्यों है?”

युवक बोला,”क्योंकि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं।”

संत ने कहा, “आँधी आने पर सबसे पहले कौन से पेड़ गिरते हैं?”

युवक बोला, “जिनकी जड़ें कमजोर होती हैं।”

संत ने कहा, “जीवन भी ऐसा ही है। जब तक मौसम अच्छा रहता है, हर पेड़ हरा-भरा दिखता है। लेकिन आँधी ही बताती है कि किसकी जड़ें मजबूत हैं।” युवक चुप रहा।

संत ने पास पड़ा एक पत्थर उठाया और उसे कुएँ में फेंक दिया। कुछ पल बाद पानी शांत हो गया।

संत बोले, “देखा, पत्थर गिरा तो पानी में हलचल हुई, लेकिन थोड़ी देर बाद पानी फिर शांत हो गया। जीवन में दुख भी ऐसे ही होते हैं। वे आते हैं, हलचल मचाते हैं और समय के साथ चले जाते हैं। लेकिन जो व्यक्ति घबराकर स्वयं ही डूब जाए, उसे कोई नहीं बचा सकता।”

युवक ने पूछा, “लेकिन जब साथ देने वाला कोई न हो, तब हिम्मत कहाँ से लाएँ?”

संत ने उत्तर दिया, “जब सब साथ छोड़ दें, तब समझो कि ईश्वर तुम्हें अपने पैरों पर चलना सिखा रहे हैं। पक्षी जिस डाल पर बैठता है, उसे डाल के टूटने का डर नहीं होता, क्योंकि उसे अपने पंखों पर भरोसा होता है।”

फिर संत ने कहा, “याद रखना, बुरे समय में तीन काम कभी मत छोड़ना— पहला, मेहनत करना। दूसरा, धैर्य रखना। तीसरा, ईश्वर पर विश्वास रखना। क्योंकि रात चाहे कितनी भी लंबी हो, सूरज को उगने से कोई नहीं रोक सकता।”

युवक की आँखों में नई चमक आ गई। उसने संत के चरण स्पर्श किए।

संत ने अंतिम बात कही—”जीवन में जब हिम्मत टूट जाए और तुम अकेले रह जाओ, तब यह मत सोचो कि सब खत्म हो गया। यह समझो कि ईश्वर ने शोर मचाने वाली भीड़ को हटाकर तुम्हें अपनी असली ताकत पहचानने का अवसर दिया है। कठिन समय तुम्हें गिराने नहीं, बल्कि पहले से अधिक मजबूत बनाने आता है।”

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “सुख में साथ देने वाले बहुत मिलते हैं, लेकिन दुख में मिला अकेलापन मनुष्य को उसकी असली शक्ति से परिचित कराता है। जो विपरीत परिस्थितियों में धैर्य और साहस बनाए रखता है, वही अंततः सफलता और सम्मान प्राप्त करता है।”

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