एक बार की बात है, एक प्रसिद्ध संत अपने शिष्यों के साथ एक गांव से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक मूर्तिकार बहुत उदास बैठा था। उसके पास कई अधूरी और टूटी हुई मूर्तियां बिखरी पड़ी थीं। संत उसके पास गए और अत्यंत शांत स्वर में पूछा, “पुत्र, तुम इतने निराश क्यों हो? तुम्हारी कला तो अद्भुत है, फिर यह उदासी कैसी?”
मूर्तिकार ने रोते हुए कहा, “महाराज, मैं इस देश की सबसे भव्य और जीवंत मूर्ति बनाना चाहता हूं। यही मेरा एकमात्र बड़ा लक्ष्य है। लेकिन मैं जब भी पत्थर पर छेनी चलाता हूं, अंत में कोई न कोई चूक हो जाती है और मूर्ति टूट जाती है। मैं थक चुका हूं। मुझे लगता है कि मैं कभी सफल नहीं हो पाऊंगा।”
संत मुस्कुराए और उन्होंने जमीन से एक छोटा सा पत्थर उठाया। उन्होंने मूर्तिकार से कहा, “जरा इस पत्थर को देखो। क्या तुम्हें पता है कि यह नदी के किनारे इतना चिकना और सुंदर कैसे बना?”मूर्तिकार ने कहा, “पानी के लगातार टकराने से, महाराज।”संत ने समझाया: “बिल्कुल सही। पानी की बूंदें बहुत कोमल होती हैं और पत्थर बहुत कठोर। लेकिन पानी ने कभी हार नहीं मानी। उसने यह नहीं सोचा कि ‘मैं इतनी कमजोर होकर इस कठोर पत्थर को कैसे बदल सकती हूं।’ पानी ने आशावादी सोच के साथ लगातार प्रयास किया, और अंततः पत्थर को अपना आकार बदलना ही पड़ा।”
संत ने मूर्तिकार के कंधे पर हाथ रखा और आगे कहा:”तुम्हारी समस्या यह है कि तुम हर असफलता के बाद यह मान लेते हो कि तुम हार गए। ऊंचे लक्ष्यों का रास्ता असफलताओं से ही होकर गुजरता है। जब तुम अगली बार छेनी उठाओ, तो यह मत सोचो कि पिछली मूर्ति टूट गई थी। बल्कि इस आशा के साथ शुरुआत करो कि इस बार तुम अपनी पिछली गलतियों से सीखकर कुछ और बेहतर बनाओगे।”मूर्तिकार को संत की बात समझ आ गई। उसने अपनी निराशा छोड़ी, एक नया पत्थर उठाया और पूरी सकारात्मकता के साथ फिर से काम में जुट गया। कई महीनों के अथक और लगातार प्रयास के बाद, उसने वास्तव में एक ऐसी अद्भुत मूर्ति बनाई जिसे देखने दूर-दूर से लोग आने लगे।
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, संतों की वाणी हमेशा हमें याद दिलाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि हमारे मन में आशा का दीपक जल रहा है और हमारे कदम लगातार आगे बढ़ रहे हैं, तो दुनिया का कोई भी लक्ष्य बड़ा नहीं है। सफलता देर-सवेर हमारे कदम चूमेगी ही।








