एक बार एक युवक बहुत दुखी होकर एक संत के पास पहुँचा। उसने कहा, “गुरुदेव, मैं समझ नहीं पाता कि जिंदगी में सब कुछ अच्छा क्यों नहीं होता। कभी मेहनत का फल नहीं मिलता, कभी अपने साथ छोड़ देते हैं, कभी दुख बिना बुलाए आ जाता है। अगर भगवान हैं, तो जीवन में केवल खुशियाँ ही क्यों नहीं देते?”
संत मुस्कुराए और उसे अपने साथ बगीचे में ले गए। वहाँ एक गुलाब का पौधा था। संत ने पूछा, “बताओ, इसमें क्या दिखाई दे रहा है?”
युवक बोला, “सुंदर गुलाब के फूल और बहुत सारे काँटे।”
संत ने एक गुलाब तोड़कर उसे देते हुए कहा,”अगर मैं कहूँ कि काँटों को हटाकर केवल फूल रहने दो, तो क्या यह पौधा जीवित रह पाएगा?”
युवक ने कहा,”नहीं गुरुदेव, काँटे ही इसकी रक्षा करते हैं। उनके बिना फूल जल्दी नष्ट हो जाएगा।”
संत बोले, “यही जीवन का रहस्य है। हम केवल फूल चाहते हैं, काँटे नहीं। लेकिन ईश्वर जानता है कि फूलों की रक्षा के लिए काँटों की भी आवश्यकता होती है।”
फिर संत उसे नदी किनारे ले गए। वहाँ एक नाविक तेज बहाव में नाव चला रहा था। संत ने पूछा, “अगर नदी में बहाव ही न हो, तो क्या नाव आगे बढ़ पाएगी?”
युवक बोला, “नहीं, बहाव और संघर्ष ही उसे दिशा देते हैं।”
संत ने कहा, “जीवन भी ऐसी ही नदी है। सुख हमें आराम देता है, लेकिन दुख हमें मजबूत बनाता है। असफलता धैर्य सिखाती है, धोखा लोगों की पहचान कराता है और कठिनाइयाँ हमारी छिपी हुई शक्ति को बाहर लाती हैं।”
युवक की आँखों में आँसू आ गए। उसने पूछा, “तो क्या दुख कभी खत्म नहीं होंगे?”
संत ने उत्तर दिया, “दुख और सुख दिन-रात की तरह हैं। यदि केवल दिन ही दिन हो, तो रात के चाँद और तारों की सुंदरता कौन देखेगा? और यदि केवल रात हो, तो सूर्योदय का आनंद कौन समझेगा? जीवन की हर कठिनाई किसी न किसी नई सुबह की तैयारी होती है।”
फिर संत ने एक बात कही, जिसे युवक जीवन भर नहीं भूला— “ईश्वर जीवन से काँटे नहीं हटाता, बल्कि काँटों के बीच मुस्कुराकर चलने की शक्ति देता है। क्योंकि जिस जीवन में सब कुछ अच्छा ही अच्छा हो, वहाँ इंसान का विकास रुक जाता है।”
धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, जिंदगी में सब कुछ अच्छा नहीं होता, क्योंकि कठिनाइयाँ ही हमें परिपक्व, धैर्यवान और मजबूत बनाती हैं। फूलों की कीमत वही जानता है जिसने काँटों के बीच चलना सीखा हो।








