धर्म

परमहंस संत शिरोमणि स्वामी सदानंद जी महाराज के प्रवचनों से—947

एक समय की बात है। राजा जनक न्यायप्रिय, धर्मात्मा और महान ज्ञानी राजा थे। उनके राजमहल में समय-समय पर बड़े-बड़े विद्वानों की सभाएँ होती थीं, जहाँ शास्त्रार्थ और आध्यात्मिक चर्चा होती थी। एक दिन यह समाचार मिला कि युवा ऋषि अष्टावक्र राजा जनक की सभा में आने वाले हैं। अष्टावक्र का शरीर जन्म से ही आठ स्थानों से टेढ़ा था, इसलिए उनका नाम अष्टावक्र पड़ा। लेकिन उनकी बुद्धि और आत्मज्ञान अद्वितीय था।

जब अष्टावक्र सभा में पहुँचे, तो कई विद्वान उनके टेढ़े-मेढ़े शरीर को देखकर हँसने लगे। अष्टावक्र भी मुस्कुरा पड़े।

राजा जनक ने पूछा, “हे ऋषिवर! सभी आपके शरीर को देखकर हँस रहे हैं, यह समझ में आता है। पर आप क्यों मुस्कुरा रहे हैं?”

अष्टावक्र ने शांत स्वर में उत्तर दिया— “महाराज! मैं इसलिए मुस्कुरा रहा हूँ कि मुझे लगा था यहाँ आत्मज्ञानी विद्वानों की सभा होगी, पर यहाँ तो केवल चमड़ी और शरीर देखने वाले लोग बैठे हैं। जिन्होंने शरीर देखा, आत्मा नहीं देखी। ऐसे लोग विद्वान नहीं, केवल चर्मदर्शी हैं।” सभा में सन्नाटा छा गया। सभी को अपनी भूल का एहसास हुआ।

राजा जनक ने विनम्र होकर कहा, “हे गुरुदेव! कृपया मुझे आत्मज्ञान प्रदान करें।”

अष्टावक्र बोले— “महाराज! यदि आप वास्तव में ज्ञान चाहते हैं, तो पहले यह बताइए—आप कौन हैं?”

राजा जनक बोले, “मैं मिथिला का राजा हूँ।”

अष्टावक्र मुस्कुराए— “राजा होना आपका पद है, आपका वास्तविक स्वरूप नहीं।”

जनक ने कहा, “तो मैं यह शरीर हूँ।”

अष्टावक्र बोले, “जब शरीर वृद्ध होगा, तब भी क्या आप बदल जाएँगे? शरीर बदलता रहता है, पर जो उसे देख रहा है, वह नहीं बदलता।”

जनक कुछ देर मौन रहे।

फिर बोले, “तो क्या मैं मन हूँ?”

अष्टावक्र ने उत्तर दिया, “मन भी कभी प्रसन्न होता है, कभी दुखी। जो मन के इन परिवर्तनों को देख रहा है, वही आपका वास्तविक स्वरूप है।”

यह सुनते ही राजा जनक गहरे चिंतन में डूब गए।

कुछ समय बाद उन्होंने कहा— “अब समझ गया हूँ। मैं न शरीर हूँ, न मन, न पद, न धन। मैं शुद्ध, चेतन और अविनाशी आत्मा हूँ।”

अष्टावक्र प्रसन्न होकर बोले— “यही आत्मज्ञान है। जब मनुष्य स्वयं को शरीर नहीं, बल्कि आत्मा समझने लगता है, तभी उसके भय, अहंकार, लोभ और मोह समाप्त होने लगते हैं।” व्यक्ति का मूल्य उसके रूप या शरीर से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, चरित्र और विचारों से होता है। बाहरी सुंदरता क्षणिक है, परंतु ज्ञान और विवेक अमूल्य हैं। पद, धन और प्रतिष्ठा मनुष्य की वास्तविक पहचान नहीं हैं। आत्मज्ञान से अहंकार समाप्त होता है और जीवन में शांति आती है। सच्चा ज्ञानी वही है, जो हर व्यक्ति में आत्मा का दर्शन करता है, केवल बाहरी रूप का नहीं।

राजा जनक ने उसी क्षण अष्टावक्र को अपना गुरु स्वीकार कर लिया और जीवनभर आत्मज्ञान के मार्ग पर चलते रहे।

धर्मप्रेमी सुंदरसाथ जी, “मनुष्य की पहचान उसके चेहरे से नहीं, उसके चरित्र से होती है। जो केवल शरीर को देखता है, वह भ्रम में रहता है; जो आत्मा को पहचान लेता है, वही सच्चे ज्ञान को प्राप्त करता है।”

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